सनातन भारतीय परम्परा में त्याग को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृध: कस्य स्विद् धनम्” की ईशोपनिषद की अमरवाणी युगों से यही सन्देश दे रही है।
यह त्याग भाव मानव प्राणी के ही मन में उल्लसित होता है, यह भी निर्विवाद है।इस त्याग की प्रथम और अन्तिम भित्ति सारी लोकालोक कामनाओं का ही त्याग माना गया है।कामनाओं के त्याग का अपर नाम तृष्णाओं का क्षय या विनाश है।
तृष्णा क्षय का सुख इह लोक और परलोक के लौकिक-स्वर्गिक सुख के सोलहवें भाग की भी बराबरी नहीं कर सकता।महाभारत में व्यासवाणी है-
यच्च कामसुखं लोके
यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्य एते
नार्हत:षोडशीं कलाम्।।
योगी भर्तृहरि अपने प्रसिद्ध नीतिशतक में ऐसी बातें का उल्लेख करते दीखते हैं-
प्राणघतान् निवृत्ति:(अहिंसा) ,परधनहरणे संयम:(अपरिग्रह),सत्यवाक्यम् (आत्मा में आगत बात का उद्घाटन तद्रूप उद्घाटन),काले शक्त्या प्रदानं( मुक्तहस्त दान),
युवतिजनकथामूकभाव:परेषां(कामिन-कांचन से परहेज),तृष्णास्रोतोविभंग:(ईश्वर प्राप्ति के अतिरिक्त कोई और कामना न होना),गुरुषु च विनय:( बडों का आदर),सर्वभूतानुकम्पा(सभी प्राणियों पर दया),सर्वशास्त्रेषु अनुपहतविधि:(सारे शास्त्रों का ज्ञान)श्रेयषामेष पन्थाः( ये सब परम श्रेयस् मार्ग है)।
इसी नीतिशतक में “तृष्णां छिन्धि”और आगे वैराग्य शतक में तो तृष्णा को पाप-परायण, हमेशा असन्तुष्ट रहने वाली कह कर धिक्कारते हैं-
तृष्णे! जृम्भसि पापकर्मपिशुने!
नाद्यापि सन्तुष्यसि।।02।।
इस प्रकार इस तृष्णा की भर्त्स्ना करने वाले भगवान् व्यासदेव हों या योगी भर्तृहरि सभी लोग इसके त्याग को मानवजीवन का निहितार्थ एक स्वर से स्वीकारते हैं।
स्वनामधन्य कबीर दास इसके त्याग के विना ” पुनि पुनि जननी -जठरे शयनम्” की शंङ्करोक्ति
का प्रबल उद्घोष करते दीखाई देते हैं-
माया मरी न मन मरा,
मर मर गए शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर।।
अस्तु, आज जब देश की आजादी का इकहत्तरवाँ वर्ष, मनाया जा रहा है ,हम पाश्चात्य संस्कृति और भाषा के प्रति अपना राग सँजोए सुखाभास में जी रहे हैं, यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि,” हम क्या से क्या हो गए “।
त्याग और तप की प्रतिमूर्ति हमारे ऋषियों का उद्घोष, जो “तैत्तिरीय उपनिषद्” को माध्यम बना कर अवतरित हुआ है ,की “दैवी वाक्” से इस चर्चा को किंचिद् विराम दिया जा रहा है-
उपनिषद् की ब्रह्मानन्द वल्ली में आनन्द की मीमांसा की गई है।जिसका आशय यह है, कि मानव से लेकर ब्रह्मा तक के सारे आनन्द “वेदज्ञ और कामनाओं से आहत न होने वाले” व्यक्ति को स्वत:प्राप्त हैं।
इस व्याख्यान में एक से बढ़कर एक बारह आनन्दाप्त व्यक्तियों की चर्चा क्रमशः इस प्रकार की गई है, जोकि कामनाओं से अनाहत मनुष्य के लिये तुच्छ है-
(1)धरती के अधिपति मानव का आनंद(2)मनुष्य गन्धर्व का आनंद(3)धेवगन्धर्व का आनंद(4)दिव्य पितृलोकस्थ पितरों का आनंद(5)चिरस्थायी पितृलोकस्थ पितरों का आनंद(6)आजानज देवलोकस्थ देवों का आनंद(7)कर्म देवों का आनंद(8)देवों का आनंद(9)इन्द्र का आनंद(10)बृहस्पति का आनंद(11)प्रजापति का आनंद(12)ब्रह्मा का आनंद।
इन क्रमश:उत्तरोत्तर वर्धमान आनन्दों की हेयता तुच्छता है ,अकामहत व्यक्ति के समक्ष।
अतः” जयदेवोक्ति”- “विगत-विषय-तृष्ण: कृष्णमाराधयामि”
ही श्रेयस्कर है।
।।हरिश्शरणम्।।
https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/16/तृष्णा-क्षय-का-सुख-सर्वोत/