भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म की दृष्टि में इस मानव शरीर को पञ्च कोशों वाला बताया गया है।आदि शङ्कर ने बड़े विस्तार से इसे समझाया है।स्थूल परिदृश्य अन्नशरीर में सूक्ष्म रूप से पंच प्राणात्मक शरीर की स्थिति है और इस प्राण शरीर में तृतीय स्थानीय मनोमय शरीर रहता है, जिसके बाद चतुर्थ स्थानी विज्ञानात्मा(जीवात्मा)और पंचम स्थानी आनन्दात्मा(परमात्मा)विद्यमान है।
पाँचों शरीरों में प्रायः प्राणियों की दृष्टि गत दृढता अन्नशरीर के स्थूल स्वरूप तक ही रह जाती है।लेकिन देवदुर्लभ मनुष्य शरीर में आकर हमें इसके आगे भी सूक्ष्म और सूक्ष्मतर मन-आत्मा-परमात्मा के बारे में भी सोचना चाहिए।यह स्थूल शरीर अहर्निश मृत्यु मुख की ओर अग्रसर है, किन्तु पूर्व शरीरों का प्रारब्ध भोग कहें या अनादि “वासना” हम द्वारस्थ मृत्यु से अचेत,अहमिदं बुद्धि कारणों से
अन्य शरीर की यात्रा पर चले जाते हैं।
अत:आचार्य ने विवेकचूडामणि में मानव जीव को सावधान रहने का निर्देश दिया है-
शवाकारं यावद्भजति
मनुजस्तावदशुचि:
परेभ्य:स्यात् क्लेशो
जननमरणव्याधिनिलय:।
यदात्मानं शुद्धं कलयति
शिवाकारमचलं
तदा तेभ्यो मुक्तो भवति
तदाह श्रुतिरपि।।397।।
अर्थात्-जब तक मनुष्य इस मृतक-तुल्य देह में वासनासक्त रहता है, तब तक तो वह अत्यन्त अपवित्र ही है।
उसे, पर(वस्तु-व्यक्ति-स्थान) से क्लेश और भय प्राप्त होता रहेगा। सुभाषित भी है-
सर्वं परवशं दु:खं
सर्वमात्मवशं सुखम्।
अतः इन कारणों से वह जन्म मरण-जरा-व्याधियों के दुश्चक्र में पड़ा ही रहता है।
लेकिन ज्योंही अपने (आत्म)को शिवाकार ,अचल और शुद्ध ,जान लेता है, उसी क्षण सारे बन्धनों, क्लेशों से मुक्त हो जाता है।
ऐसी स्थिति प्राप्त करने हेतु अनादि शरीर वासना से दूर होना पड़ेगा, जोकि वैराग्य की वैराग्य की चरमावस्था है।
चित्त में अहंशून्यता , बोध की चरमावस्था है तथा लीन हुई वृत्तियों की पुनरुत्पत्ति न होना “उपरामता” की चरम सीमा है।
वासनानुदयो भोग्ये
वैराग्यस्य परोवधि:।
अहंभावोदयाभावो
बोधस्य परमोवधि:।
लीनवृत्तेरनुत्पत्ति:
मर्यादोपरत:तु सा।।425।।
इसके पहले पद्यों में उन्होंने चित्त शान्ति के कारण आत्मानन्द की अनुभूति बताई है, जोकि “उपरति”का फल है।और यह उपरति वैराग्य से फलित बोध के कारण पाई जा सकती है-
वैराग्यस्य फलं बोधो
बोधस्योपरति: फलम्।
स्वानन्दानुभवात् शान्ति:
एषैवोपरते: फलम्।।420।।
अन्त में योगावतार लाहिड़ी महाशय के “क्रियायोग” की स्वात्मानुभूति दायिनी पीयूष वर्षिणी वाणी से इस प्रकरण का समाहार किया जा रहा है-
” यह याद रखो कि तुम किसी के नहीं हो और कोई तुम्हारा नहीं है। इस पर विचार करो कि किसी दिन तुम्हें इस संसार का सब कुछ छोड़कर चल देना होगा, इसलिए अभी से भगवान् को जान लो।
“ईश्वरानुभूति के गुब्बारे में प्रतिदिन उड़कर मृत्यु की भावी सूक्ष्म यात्रा के लिये अपने को तैयार करो।माया के प्रभाव में तुम अपने को हाड़-मांस की गठरी मान रहे हो, जो दु:खों का घर मात्र है।
“अनवरत ध्यान करो ताकि तुम जल्दी से जल्दी अपने को सर्वदु:ख-क्लेशमुक्त अनन्त परमतत्व के रूप में पहचान सको ।क्रियायोग की गुप्त कुंजी के उपयोग द्वारा देह-कारागार से मुक्त होकर परमतत्व में भाग निकलना सीखो।”
।।हरिश्शरणम्।।