आत्मज्ञान का मूल मनोनिग्रह

इस मानव शरीर में पांच शरीर हैं।मन वाला शरीर सबके मध्य में है।इस मनोमय शरीर के पहले-स्थूलाकृति स्थूल शरीर और सूक्ष्माकृति पंच प्राण शरीर ,ये दो शरीर हैं।मध्यस्थ मनोमय के पश्चाद्वर्ती भी दो शरीर हैं-विज्ञानात्म(जीवात्मा)और आनन्दात्म(परमात्मा)जोकि सूक्ष्मतम हैं।
इस प्रकार एक स्थूल+सूक्ष्म पूर्व में और बाद में सूक्ष्मतम+
सूक्ष्मतम शरीरों का मध्यवर्ती है , मन वाला शरीर, जोकि स्वयं में भी अपने पश्चाद्वर्तियों
की ही तरह सूक्ष्म है।
यही मनोमय सारी भ्रान्ति और समग्र शान्ति का भी कारक होता है। बिना मनोयोग के कोई भी लौकिकालौकिक प्राप्ति सम्भव नहीं है।
एक योगी की बात इसके बारे में इस प्रकार है-
“मन ही मांस पेशियों को नियंत्रित करता है।जैसै हथौड़े के आघात की शक्ति उस पर लगाये गये बल पर निर्भर करती है, वैसे ही मनुष्य की शारीरिक शक्ति की अभिव्यक्ति उसकी आक्रामक इच्छा शक्ति की तीव्रता और साहस पर निर्भर करती है।
मन ही अक्षरशः शरीर का निर्माण करता है और वही उसे जीवित भी रखता है।गत जन्मों(शरीरों)की प्रवृत्तियों की प्रबलता के अनुसार अच्छे या बुरे स्वभाव गुण धीरे-धीरे मानव-चेतना में उतरते हैं।
यही स्वभाव गुण आदतों में ढल जाते हैं और ये आदतें फिर एक वांछनीय या अवांछनीय शरीर के रूप में प्रदर्शित होती हैं।
वाह्य दुर्बलताओं की जड़ में मन होता है और आदतों से लाचार शरीर ,मन अवहेलना भी करता है।इस प्रकार यह कुचक्र चलता रहता है।
समझने की बात है कि, यदि मालिक, नौकर की आज्ञा का पालन करने लगे तो नौकर निरंकुश स्वेच्छाचारी बन जाता है।इसी प्रकार, मन भी शरीर की आज्ञाओं का पालन कर -कर के उसका दास बन जाता है।”
आत्मानुभूत एक सिद्ध योगी की ऐसी बातें, यह भी सिद्ध करती हैं योगीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने” मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:” क्यों कह दिया था।
अतः वायु के समान सुदुष्कर बांधने योग्य मन को उन्हीं भगवदैक-चरण-शरण होकर ही बड़ी सहजता सरलता से अन्यज्जन्म कारण होने और भटकने से बचाया जा सकता है।
सारे पूजा-पाठ,दान-धर्म- कर्म,यम-नियम, शास्त्राध्ययन
तीर्थाटन और उत्तमोत्तम व्रतों का अन्तिम फल मन को भगवत् चिंतन में एकाग्र करना ही है।यह बात उद्धवजी के लिये भगवान् ने श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में कही हैं।
आज उन्हीं लीलापुरुषोत्तम के प्राकट्योत्सव के अवसर पर,
तुभ्यमेव समर्पये की धारणा से, उनकी बात कहकर वाणी को विराम दिया जा रहा है-
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च,
श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता:
परं हि योगो मनस:समाधि:।।
-श्रीमद्भागवत: एकादशस्कन्ध।

।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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