विवेकचूडामणि में आचार्य शङ्कर ने भगवान् की माया से निर्मित संसार की चर्चा की है।इस माया से ही संसार के सभी द्वैतों की सृष्टि और विनष्टि प्रतीत होती है।वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तो समष्टि प्रकृति का ही तिरोभाव हो जाता है और एक अद्वैत परमात्मा अवभासित हो जाता है-
माया मात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थत:।इति ब्रूते श्रुति:साक्षात्सुषुप्तावपि
अनुभूयते।।406।।
इसके पूर्व आचार्य ने शरीर को पाँच कोशों- अन्न-प्राण-मन -विज्ञान और आनन्द के द्वारा निर्मित बताया है,जिनसे आवृत हुआ आत्मा अपनी ही शक्ति से उत्पन्न हुए शैवाल-समूह के द्वारा ढँके हुए बावली के जल की भाँति नहीं भासता-
कोशैरन्नमयाद्यै:पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति।
निजशक्तिसमुत्पन्नै:शैवाल-पटलैरिवाम्बु वापीस्थम्।।151।।
1-अन्नमयकोश-
देहेयमन्नभवनोन्नमयस्तु कोश:
चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीन:।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीष-राशि: नायं स्वयं भवितुमर्हति
नित्यशुद्ध:।।156।।
अन्न से उत्पन्न यह दृश्यमान शरीर ही अन्नमय कोश है।यह अन्न से ही जीवित रहता हुआ, उसके बिना, उसी में विलीन हो जाता है।त्वचा, चर्म,मांस, रक्त अस्थि और मलादि संघात वाले शरीर को नित्यशुद्धात्मा नहीं कहा जा सकता।अतः इसमें आत्मबुद्धि त्याग कर सर्वात्मा ब्रह्म(निर्विकल्प)में आत्मत्व जानकर शान्ति पाए-
अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे
त्वङ्मांसमेदोस्थिपुरीषराशौ।
सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे
कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व।।163।।
2- प्राणामयकोश-
कर्मेन्द्रियैः पंचभिरञ्चितोयं
प्राणो भवेत्प्राणमयस्तु कोश:।
येनात्मवानन्नमयोन्नपूर्ण:
प्रवर्ततेसौ सकलक्रियासु।।167।।
चर्मचक्षुओं से दीखने वाले इस अन्नमय शरीर(कोश)में ,सभी जगह व्याप्त रहने वाला प्राणमय शरीर है। यह शरीर पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच प्राणों के संचय से विनिर्मित है।इन्हीं प्राण-अपान-समान-व्यान और उदान की अन्नशरीर में समवस्थिति समग्र शरीर को संचालित करती है। सारी क्रियाओं का जनक यही प्राणमय कोश ही है। इसके विना शरीर का जीवित रहना असंभव है।स्थूलान्नमय शरीर का संचालक होकर भी, यह आत्मा नहीं है,क्योंकि वायुविकार कैसे आत्मा होगा।
3-मनोमयकोश-
ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमय:स्यात्।कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतु:।
संज्ञादिभेदकलनाकलितो
बलीयांस्तत्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते य:।।169।।
यह अपने पूर्व-पूर्व के कोशों अन्न और प्राण को अभिव्याप्त करके अवस्थित है।पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ और स्वयं मन ही मनोमय कोश है।यह सभी के, मैं-मेरा आदि विकल्पों का हेतु है।यह सूक्ष्म रूप से सम्पूर्ण अन्त:वहि:विराजमान होकर नाना नामरूपात्मक जगत् का कारण है।
यही सारी अविद्या का मूल है।
सुषुप्ति कालमें” मैं सुखपूर्वक सोया” ऐसा जागने पर भान होता है।उस सुषुप्ति में मन का विलीनीकरण होने से कुछ भी भान नहीं रहता।अतः यही कोश या शरीर समस्त संसार का सृजन करता है।सारा संसार इसी की कल्पना मात्र है-
सुषुप्तिकाले मनसि प्रलीने
नैवास्ति किंचित्सकलप्रसिद्धे:।
अतो मन:कल्पित एव पुंस:
संसार एतस्य न वस्तुतोस्ति।।173।।
आचार्य ने इसे भयंकर व्याघ्र भी कह दिया, जो विषयरूपी वन में विचरता है।साधक साधु मुमुक्षु वहाँ निश्चय ही न जायें-
मनो नाम महाव्याघ्रो
विषयारण्यभूमिषु।
चरति अत्र न गच्छन्तु
साधव: ये मुमुक्षव:।।178।।
4-विज्ञानमय कोश
अन्न,प्राण और मनोमय शरीर में अत्यन्त सूक्ष्म भाव से सभी को व्याप्त करके रहनेवाला, विज्ञान मय शरीर(कोश)है।इस शरीर में ज्ञान इन्द्रियों के साथ ,वृत्ति युक्त बुद्धि ही कर्तृत्व भाव से विद्यमान रहती है।यह भी मनुष्य के जननादि बन्ध हेतु है-
बुद्धि: बुद्धीन्द्रियै: सार्धं
सवृत्ति: कर्तृलक्षण:।
विज्ञानमय कोश: स्यात्
पुंस: संसार-कारणम्।।186।।
चेतन की ही प्रतिबिंब शक्ति, एक दूसरे शरीर का आश्रय लेकर इन्द्रियादि का अनु-गमन करने वाली होने से विज्ञानमय कही गई है।
अनुव्रजत्चित् प्रतिविम्बशक्ति:
विज्ञानसंज्ञ: प्रकृतेर्विकार:।।187।।
इसी विज्ञानमय की ही जीवात्म-भाव होने से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि त्रिविध अवस्थायें होती हैं-
अस्यैव विज्ञानमयस्य जाग्रत्-
स्वप्नाद्यवस्था: सुखदु:खभोग:।।189।।
अनादिकालोयमहंस्वभाव:
जीव: समस्तव्यवहारवोढा।।188।।
विज्ञानकोशोयमतिप्रकाश:
यदात्मधी:संसरति भ्रमेण।।190।।
इस प्रकार यह विज्ञानमय ,बुद्धि द्वारा आत्मा का अत्यन्त निकट होने से (अनादिकालोयमहं स्व-भावो)अहंकार स्वभावत्वेन जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है।
4-आनन्द मयकोश-
यह आनन्द मय शरीर अपने पूर्व शरीर विज्ञान में अभिव्याप्त है।आचार्य कहते हैं-आनन्द स्वरूप आत्मा के प्रतिविम्ब से चुम्बित एवं तमोगुण से प्रकाशित वृत्ति आनन्द मय कोश है।यह प्रिय, मोद और प्रमोद इन तीन गुणों से युक्त तथा अपने अभीष्ट पदार्थ के पाने पर प्रकट होती है।पुण्य कर्मों के परिपाक से तदनुकूल सुखानुभूति काल में पुण्यशाली लोगों को इसका स्वयं भान होता है।इससे जीव निष्प्रयास अत्यंत आनन्दित होता है-
आनन्दप्रतीविम्बचुम्बिततनु:
वृत्तिस्तमोज्जृम्भिता
स्यादानन्दमय:प्रियादिगुणक:
स्वेष्टार्थलाभोदय:।
पुण्यस्यानुभवे विभाति
कृतिनामानन्दरूपप:स्वयं
भूत्वा नन्दति यत्र साधु
तनुभृन्मात्र:प्रयत्नं विना।।209।।
इसको स्वयंप्रकाश आत्मा, अन्नमयादि पाँचों कोशों में अद्वितीय, जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं का साक्षी,सत् स्वरूप समस्त शरीरों का आत्मा जानना चाहिए-
योयमात्मा स्वयंज्योति:
पञ्चकोशविलक्षण:।
अवस्थात्रयसाक्षीसन्
विकारो निरंजन:।
सत्स्वरुप:स विज्ञेयः
स्वत्मत्वेन विपश्चितता।।213।।
।।हरिश्शरणम्।।
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