आचार्य शङ्कर ने विवेकचूडामणि में मानव के स्थूल शरीर और इन्द्रियों का सम्यग् विवेचन किया है, जिसमें आत्म बुद्धि होकर ,वह भव-बन्ध में जकड़ा रहता है।
ऋषियों ने इस शरीर में आसक्त मानव जीव को सावधान करते हुए कहा-
सर्वोपि वाह्यसंसार:
पुरूषस्य यदाश्रय:।
विद्धि देहमिदं स्थूलं
गृहवद् गृहमेधिन:।।92।।
जिसके आश्रयण से जीवात्मा को समस्त वाह्य जगत् की प्रतीति होती है, वही उस गृहस्थ के घर की तरह, उसकी स्थूल देह है।इसी स्थूल देह के ही जन्म, जरा ,मरण,स्थूलता आदि विक्रियायें हैं।शिशु आदि अवस्थायें हैं ,वर्णाश्रमादि अनेक यम और नियम हैं।इसी की पूजा
मानापमान आदि विषेताएं हैं-
स्थूलस्य सम्भवजरा-
मरणानि धर्मा:।स्थौल्यादयो
बहुविधा:शिशुताद्यवस्था:।
वर्णाश्रमादिनियमा बहुधा
यमा: स्यु: ।पूजावमानबहु-
मानमुखा: विशेषा: ।।93।।
त्वचा, मांस, रूधिर, स्नायु, मेद,मज्जा और अस्थियों के समूह इस शरीर में मलमूत्रादि भरे रहते हैं, जिससे यह शरीर, निन्द्य कहा जाता है-
त्वङ्मांसरूधिरस्नायु-
मेदोमज्जास्थिसंकुलम्।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां
स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः।।89।।
इसी शरीर में पांच ज्ञान इन्द्रियाँ- श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा तथा पांच कर्म इन्द्रियाँ-वाक् ,पाणि,पाद,गुदा और उपस्थ ये सभी होती हैं।इन्हीं से विषयों का ज्ञान होता है।
बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्
वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थ:
कर्मेन्द्रियाणि प्रणवेन कर्मसु।।94।।
इसी में प्राण वृत्ति अपने अन्य विकारों-अपान ,व्यान ,उदान और समान के साथ सूक्ष्म रूप से रहती है, जिससे शरीर का संचालन सम्यग् रूप से होता है।
और भी सूक्ष्यमेन्द्रियाँ वृत्ति रूप में इसी स्थूल शरीर में रहती हैं, जिन्हें अन्तरिन्द्रिय या अन्त:करणचतुष्टय कहा गया है-ये हैं -मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।संकल्प-विकल्प के कारण मन, पदार्थ का निर्णय/निश्चय करने के कारण बुद्धि ,अहम्-अहम् ऐसा इस शरीर को ही मान लेने से अहंकार तथा अपने इष्ट अभीष्ट अभिलाष चिन्तन के कारण चित्त कहा जाता है-
निगद्यतेन्त:करणं मनोधी:अहंकृति:चित्तमिति स्ववृत्तिभि:।मन:तु संकल्प-विकल्पनादिभि:बुद्धि:पदार्थ-अध्यवसाय-धर्मत:।।95।।
अत्राभिमानाद् अहमित्यहं-
कृति:,स्वार्थानुसन्धान-
गुणेन चित्तम् ।।96।।
ऐसे देहेन्द्रिय,विषयों में आसक्त, स्वस्वभावानुसार एक से एक बँधे हुए जीवादि-हरिण,हाथी, पतंग, मछली औरभ्रमरादि सभी प्रतिपल मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं।तब शब्द, स्पर्श, रूप,रस,गन्ध पाँच विषयों में जकड़ा हुआ मनुष्य कैसे बच सकता है-
शब्दादिभि:पञ्च भिरेव पञ्च
पञ्चत्वमापु: स्वगुणेन बद्धा:।
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गमीन-
भृङ्गा नर:पञ्च भिरञ्चित: किम् ।।78 ।।
।।हरिश्शरणम्।।