स्थूल शरीर का विवेचन करने के उपरान्त विवेकचूडामणि-कार ने सूक्ष्म शरीर और उसमें व्याप्त गुणों का वर्णन किया है।
(वाक्-पायू-पस्थ-हस्त-पाद) पाँच कर्मेन्द्रियों, (श्रोत्र-त्वक्-चक्षुषी-जिह्वा-नासिका) इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों ,(प्राणापान-समान-व्यानोदान)पञ्च प्राणों,(क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर) पञ्च महाभूतों, अन्त:करण चतुष्टय, अविद्या, काम और कर्म का संघात सूक्ष्म शरीर कहा जाता है।
वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च
प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च।
बुध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी
पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु:।।98।।
इसे सूक्ष्म या लिंगशरीर भी कहा गया है, जो वासनात्मक कर्मफलों को अनुभव कराने वाला है।अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होने से, यह आत्मा की अनादि उपाधि है-
इदं शरीरं शृणु सूक्षमसंज्ञितं
लिंगं त्वपंचीकृतभूतसंभवम्।
स-वासनं कर्मफलानुभावकं
स्वज्ञानतोनादिरुपाधिरात्मन:।।।99।।
स्वप्न इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था है।जिसमें यह स्वयं अवशिष्ट मात्र अवभासित होता है।इस स्वप्न में स्वयं प्रकाश परात्मा शुद्ध चेतन ही विभिन्न पदार्थों के रूप में दृश्यमान होता है।इसमें जाग्रत् कालिक नाना अवस्थाओं के कारण, बुद्धि, कर्ता-भोक्ता भावों को प्राप्त होकर स्वयं प्रतीत होती है।
स्वप्नो भवत्यस्य विभक्त्यवस्था
स्वमात्रशेषेण विभाति यत्र।
स्वप्ने तु बुद्धि:स्वयमेव जाग्रत्-
कालीननानाविधवासनाभि:।
कर्त्रादिभावं प्रतिपद्य राजते
यत्र स्वयं ज्योतिरयं परात्मा।।100।।
शरीर के अन्दर इन इन्द्रियों में चिद् के आभास से व्याप्त अन्त:करण अभिमान के रूप में स्थित रहता है।सत्वादि गुणों के योग से यही त्रिविधावस्था को प्राप्त होता है-
अहङ्कार:स विज्ञेयः
कर्ताभोक्ताभिमान्ययम्।
सत्वादिगुणयोगेन
चावस्थात्रयमश्नुते।।105।।
बन्धन में पड़ा हुआ यह अहंकार
ही तीनों गुणों में आसंग से जनन-मरण क्रम धारण करता है।गुणों का स्वरूप इस प्रकार है-
रजोगुण में काम,क्रोध, लोभ, दम्भ,असूया(गुणों में भी दोषदृष्टि),अभिमान, ईर्ष्या और
मात्सर्य-ये सभी होते हैं।इससे प्रवृत्त”अहंभाव”संसार बन्ध का कारण है-
काम:क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया-
हंकारेर्ष्यामत्सराद्या: तु घोरा:।
धर्मा एते राजसा: पुम्प्रवृत्ति:
यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतु:।।114।।
जन्म-मरण का आदि कारण ,जो विक्षेप शक्ति(नाना विषयों में चित्त को फेंकने वाली)के प्रसार का कारण है, तमोगुण कहा गया है।इसके कारण ही वस्तु कुछ की कुछ दीखने लगती है और यही आवरण शक्ति(आत्मस्वरूप को ढँकने वाली) की भी मूल है।
एषा वृत्तर्नाम तमोगुणस्य
शक्तिर्यया वस्त्ववभासतेन्यथा।
सैषा निदानं पुरुषस्य संसृते:
विक्षेपशक्ते:प्रसरस्य हेतु:।।115।।
इसमें अज्ञान, आलस्य,जडता, प्रमाद,मूढता, आदि रहते हैं।इससे युक्त मनुष्य कुछ नहीं समझता और निद्रालु या स्तम्भवत् जड बना रहता है-
अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा-
प्रमादमूढत्वमुखा: तमोगुणा:।
एतै:प्रयुक्तो न हि वेत्ति किंचित्
निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति।।118।।
इस प्रकार रजोगुण बद्ध शरीर का वर्णन करने के बाद आचार्य ने सत्वगुण के धर्म बताये हैं।
यह सत्वगुण जल के समान शुद्ध है, किन्तु रज-तम से मिलकर प्रवृति उत्पन्न करता है।
सत्वं विशुद्धं जलवत्तथापि
ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते
मिश्रस्य सत्वस्य भवन्ति धर्मा-
स्त्वमानिताद्या नियमा यमाद्या:।
श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षता च
दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्ति:।।119/120।।
इसके कारण अमानित्व ,यम-नियमादि, श्रद्धा, भक्ति,मुमुक्षता,दैवी सम्पत्ति और असत् के त्याग की स्थिति होती है।किन्तु इसमें रजस्तम का मिश्रण अवश्य रहता है।
इस प्रकार त्रिविध गुणों के संधात से निर्मित शरीर इन्द्रियादि विषयासक्त होकर ,अहंकार वश जन्मता मरता है।
ये सभी प्रकृति के भी गुण हैं, जिसे अव्यक्त की संज्ञा दी गई है।त्रिविध गुणों से युक्त प्रकृति ही आत्मा का “कारण शरीर”है।
इसकी अभिव्यक्ति की अवस्था”सुषुप्ति’ है, जिसमें बुद्धि की सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं,बीज रूप से स्थिर रहती हैं-
अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं
तत्कारणं नाम शरीरमात्मन:।
सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था
प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्ति:।।122।।
।।हरिश्शरणम्।।
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