आदि शङ्कर ने विवेकचूडामणि में मोक्ष के साधनों पर गहन विमर्श किया है। ब्रह्म का सत्यत्व और जगत् का मिथ्यात्व नित्यानित्य वस्तु विवेक कहा गया है और यही प्रथम हेतु है-
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
इति एवं रूपो विनिश्चय:
सोयं नित्यानित्यवस्तुविवेक:
समुदाहृत:।।20।।
इसके बाद “वैराग्य”की उत्पत्ति होती है।दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियों द्वारा देह से लेकर ब्रह्म लोक पर्यन्त अनित्य भोग्य पदार्थों में घृणा बुद्धि होना ही”वैराग्य”है-
तद् वैराग्यं जगुप्सा या
दर्शनश्रवणादिभि:।
देहादिब्रह्मपर्यन्ते हि
अनित्ये भोगवस्तुनि।।21।
तदनन्तर शम,दम ,उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान पूर्वक आसक्ति युक्त कर्मों का सर्वथा त्याग करना चाहिए।
शम-बारम्बार विषयों में दोषदृष्टि करने से, विषय समूह से विरक्त होकर चित्त का अपने लक्ष्य में स्थिर होना’शम’है।
विरज्य विषयव्रताद्
दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः
स्वलक्ष्ये नियतावस्था
मनस: शम उच्यते।।22।।
इसी तरह पाँचों कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को उनके-उनके विषयों से अलग करके अपने-अपने गोलकों में स्थित करना “दम” कहा गया।और वृत्ति का वाह्य विषयों का आश्रयण न करना ” उपरति “है ।
विषयेभ्य: परावर्त्य
स्थापनं स्व-स्व-गोलके
उभयेषामिन्द्रियाणां स
दम: परिकीर्तित: ।
वाह्यालम्बनं वृत्ते:
एषा उपरति:उत्तमा ।।23/24।।
आगे के क्रम में तितिक्षा है,जिसमें चिन्ता-शोक से रहित होकर विना किसी प्रतीकार के समस्त कष्टों को सहना पड़ता है-
सहनं सर्वदुःखानाम्
अप्रतीकारपूर्वकम्।
चिन्ता-विलापरहितं सा
तितिक्षा निगद्यते।।25।।
गुरवाक्यों और शास्त्र में सत्यत्व बुद्धि रखना, इसी को सज्जनों ने ” श्रद्धा ” कहा है।
शास्त्रस्य गुरूवाक्यस्य
सत्यबुद्ध्यावधारणम्।
सा श्रद्धा कथिता सद्भि:
यया वस्तूपलभ्यते।।26।।
सर्वदा स्थापनं बुद्धे:
शुद्धे ब्रह्मणि सर्वथा।
तत्ममाधानमित्युक्तं
न तु चित्तस्य लालनम्।।27।।
इस तरह अपनी बुद्धि में सभी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में ही सदा स्थिरावस्थ होना,” समाधान” है।
उपर्युक्त शमदमोपरतितितिक्षा-श्रद्धासमाधान को वेदान्त शास्त्र के विद्वानों ने “षट्कसम्-पत्ति “कहा है।
ऐसे साधनों का अवम्बनकर्ता वास्तव में मुमुक्षु और निर्वाण सुख का अधिकारी है-
तत: श्रुति: तन्मननं सतत्वध्यानं चिरं नित्य-
निरन्तरं मुने: ।
ततोविकल्पं परमेत्य
विद्वान् इहैव निर्वाण-
सुखं समृच्छति।।72।।
।।हरिश्शरणम्।।