आदि शङ्कर-पाद ने “विवेकचूडामणि”में अहंकार का स्वरूपानुसन्धान किया है।अजन्मा, नित्य, शुद्ध, बुद्ध,चैतन्यात्मा, जो कि परमात्मा अंशी का अंश मात्र है, सदा कूटस्थ, अविचल, आकाश शरीरस्वरुप से अभिन्न ही है।
वे कहते हैं कि वागादि पांच कर्मेन्द्रियाँ, श्रवणादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणों सहित पञ्च प्राण, आकाशादि पञ्च महाभूत, बुद्धि आदि अन्त:करण चतुष्टय, अविद्या-काम और कर्म ये ही मिलकर”पुर्यष्टक” अथवा सूक्ष्म शरीर कहे जाते हैं।
वागादि पञ्च श्रवणादिपञ्च
प्राणादिपञ्चाभ्रमुखानि पञ्च।
बुध्याद्यविद्यापि च कामकर्मणी
पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु:।
यह सूक्ष्म या लिंगशरीर अपंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ है।यही वासनात्मक होकर कर्मफलों का अनुभोक्ता और अनुभावक है।
शरीर के अन्दर चक्षु आदि इन्द्रिय के गोलकों में चिदाभास के तेजसे व्याप्त हुआ अन्त:करण ही “मैं पन ” का आभास करता हुआ स्थित रहता है।
अन्त:करणमेतेषु
चक्षुरादिषु वर्ष्मणि ।
अहमित्यभिमानेन
तिष्ठत्याभासतेजसा।।105।।
इसी को अहंकार जाने।यही कर्ता, भोक्ता तथा मैं पन का अभिमान कराने वाला है और सत्वादि गुणों से त्रिविधावस्था को प्राप्त होता है।
अन्तिम बात इसके लिये आचार्य ने कहा-
विषयाणामानुकूल्ये
सुखी दु:खी विपर्यये ।
सुखं दु:खं च तद्धर्म:
सदानन्दस्य नात्मन।।1०7।।
यही अहंकार विषयों की अनुकूलता-प्रतिकूलता में सुखी-दु:खी होता रहता है।सुख और दुख इसी अहंकार के धर्म हैं।नित्यानन्द स्वरूप आत्मा के कदापि नहीं।
।।हरिश्शरणम्।।
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