भगवत्पाद आदि शङ्कराचार्य ने तीन चीजें को अत्यन्त दुर्लभ कहा है। “विवेकचूडामणि”नामक ग्रन्थ में उन्होंने उक्ति है-
दुर्लभं त्रयमेवैतद्
देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।3।।
अर्थात् इस संसार में तीन दुर्लभ तत्व हैं-पहला मनुष्य योनि में जन्म, दूसरा संसार बन्ध से मुक्ति की कामना और तीसरा सत्पुरुषों का आश्रयण।
इन तीनों की प्राप्ति भी तभी सम्भव होती है, जब देवता गुरु का अनुग्रह प्राप्त हो।
आगे आचार्य पुनः इसी की पुष्टि करते हैं-
लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म
दुर्लभं
तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्।
य:स्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधी:
स हि आत्महा स्वं विनिहन्ति
असद्ग्रहात्।।4।।
किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर और उसमें भी,जिसमें वेदादि सिद्धान्तों का ज्ञान होता है ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढबुद्धि अपने आत्मा की मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता, वह असद् में आस्था रखने के कारण स्वयं को नष्ट करता है।
यह मुक्ति कामना और सम्यक् तत्वावबोध,आत्मानात्म का विवेक, जो समस्त प्रतीतियों का चरम साक्षी “आत्मा” है, उसका अनुभव तथा आत्मा के विषय होने वाले “अनात्मा”का ज्ञान,देवगुरु कृपया ही प्राप्त होता है।वे कहते हैं-
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान्
संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृह:सन्।
सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं
तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा।।3।।
इसीलिये मुमुक्षु विद्वान् वाह्य भोगीवृत्ति त्याग कर सन्त शिरोमणि गुरु-देव के शरणागत होकर, उनके उपदेश किये हुए विषयों में समाहित चित्त से मुक्ति हेतु प्रयत्न करे।
।।हरिश्शरणम्।।