आज मन में यह भाव आया कि,यह भाव क्या है। शाब्दिक दृष्टि से इसमें “भू ” धातु है, जिसका अर्थ सत्ता या अस्तित्व है।हमारी समझ में यह मानव प्राणी ही है, जिसमें अस्तित्व बोध होता है। ऐसा भाव मनुष्य में ही आता है, क्योंकि यह केवल भोग योनि नहीं, प्रत्युत कर्म योनि भी है। भू : भवनं भाव: भावनम् इत्यादि अपना(मानव) अस्तित्व विचार करने और तदनुकूल मानवीय गुणों को आत्मसात् करने के लिए झकझोरते हैं ।इसीलिये कहा भी गया-
यादृशी भावना यस्य
सिद्धि: भवति तादृशी।।
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।
न काष्ठे विद्यते देवो
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देवो
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
तात्पर्यत: किसी काष्ठ, पाषाण या स्वर्ण मयी मूर्ति में देवता नहीं हैं, बल्कि हमारी अपनी भावना में ही देवत्व है ,इसलिये भाव का अवलम्बन ही सर्वश्रेष्ठ है।हम मनुष्य हैं ,हमें मानवता पूर्ण ही व्यवहार करना चाहिए।
वस्तुतः मानव जीवन में भाव या भावना ही है, जो उसे लौकिक/अलौकिक अवस्थान की प्राप्ति कराती है। इसलिए क्रान्तदर्शी कवि का भाव शब्दों की मूर्ति बन गया-
भरा नहीं जो भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं वह पत्थर है
जिसमें स्व-देश से प्यार नहीं।
जिसको स्व – अपने ,अपनी आत्मा से प्यार नहीं वह चेतनात्मा नहीं बल्कि परिवर्तन शील/जड़ प्रकृति मात्र गुणों से प्रेम करनेवाला “पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम् ” की श्रेणी में रहने वाला है।
।।हरिश्शरणम्।।
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