द्वितीयाध्याय गीता में भगवान् ने निष्काम कर्म का बड़ा सुन्दर सन्देश दिया है।यह श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध है-
कर्मणि एव अधिकार: ते
मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल-हेतुः भू
मा ते संङ्ग: अस्तु अकर्माणि।।
अर्थात् कर्तव्य कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है।फलों में कभी नहीं।कर्मफल का हेतु मत बनो।अकर्म में भी आसक्ति न हो।
“कर्मणि एव अधिकार:” तत्वतः मानवेतर योनियों को नवीन कर्म की स्वतंत्रता नहीं है।मानव योनि कर्मयोनि है और अन्य योनियां भोगयोनि मात्र।देवदुर्लभ मानव शरीर द्वारा पुरातन कर्मों का फलभोग और नवीन कर्मों से पुरुषार्थ होता है।कीट-पतंग, पशु-पक्षी, देवता ब्रह्म लोक तक की योनियां भोग योनियां हैं।उनके लिये-“ऐसा करो ,ऐसा न करो “का विधि-निषेध नहीं है।जब कि मनुष्य विधि निषेध पूर्वक प्रारब्ध फल भोगते हुए, नवीन कर्म करने में स्वतंत्र होने से आत्मोद्धार में में भी स्वतंत्र है।
“मा फलेषु कदाचन” मतलब कि कर्मफलों में किंचित् अधिकार नहीं।तात्पर्य ये कि, फलेच्छ कर्म करने पर जन्म-मृत्यु रूप बन्धन प्राप्त होगा( फले सक्तो निबध्यते-5/12)।फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्व पर कर्तव्य टिका हुआ है और फलेच्छा मिटने से कर्तृत्व मिटेगा,जिससे मनुष्य कर्म करता हुआ भी नहीं बंधेगा।”फल में तेरा अधिकार नहीं” इसका स्वारस्य ये भी है कि, मनुष्य को यह स्वतंत्रता है कि वह फल के साथ अपना सम्बन्ध चाहे जोड़े या नहीं, इसमें वह स्वतंत्र है।
जब कर्म अनित्य हैं, तब उनका फल भी अनित्य है।अनित्य से नित्य मिलेगा नहीं।ऐसा समझ लेने पर निष्काम कर्मता आ जायेगी शनैः शनैः।
“मा कर्मफल-हेतु: भू ”
मतलब कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन ,बुद्धि आदि कर्मसामग्री के साथ ईषन्मात्र ममता न हो,क्योंकि ऐसा होने पर वह कर्म फलों का हेतु बन जायेंगीं।
(केवलैरिन्द्रियैरपि….. संगं त्यक्त्वा आत्मबुद्धये )में यही बात कही गई है।
“मा ते संग:अस्तु अकर्माणि ”
अर्थात् कर्म न करने में आसक्ति होगी नहीं, बल्कि स्वस्वभाव से प्रकृत्या आलस्य-प्रमादादि होंगे ही, जो तमोगुणात्मक भोग सुख की अनुभूति करायेंगे, अतः बन्धन भी होगा।इसलिये परिवर्तन शील वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया,घटना अवस्था, स्थूल-कारण-सूक्ष्म-कारण शरीर के साथ सथ साधक को निर्लिप्त भाव से रहना चाहिए।
श्लोक के प्रथम-तृतीय पाद में समानता है-कर्म करने में ही अधिकार तथा कर्म न करने में अनासक्ति।
इसी प्रकार द्वितीय-चतुर्थ में-क्रमशः फलेच्छा निषेध और फल-हेतु बनने का निषेध।
तात्पर्यत: अकर्म में रूचि होने से प्रमादालस्य(तामस),कर्म तथा कर्मफलों में रूचि से(राजस)एवं इन सभी में रूचि न होने पर विवेक पूर्वक कर्मस्पृहा रहने पर सुखानुभूति के प्रकाश से(सात्त्विक)भावों के साथ सम्बन्ध बनता है।यही गुण-कर्म सम्बन्ध बन्ध कारक है।
अतः साधक को कर्म ,कर्मफल और त्याग सुखों में से किसी भी एक के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिए।यही निष्काम कर्म का विवेचन है।
।।हरिश्शरणम्।।
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