गीता के बारहवें अध्याय में 13 से लेकर 19 श्लोकों तक भगवान् ने भक्त का स्वरूप बताया है-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां
मैत्र: करुण एव च।
निर्ममो निरहंकार:
समदुःखसुखः क्षमी।।१३।।
सन्तुष्ट: सततं योगी
यतात्मा दृढनिश्चय:।
मयि अर्पितमनोबुद्धि:
यो मद्भक्त:स मे प्रिय:।।14।।
जो मनुष्य सभी से घृणा रहित, सभी से नि:स्वार्थ मैत्री करनेवाला, करूणा पूर्ण,अपने पन से रहित, मैं-मेरे की भावना से रहित, सुख दुःख में समान, क्षमाशील,सतत सन्तुष्ट, भगवद् ध्यान परायण, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में करनेवाला, वज्र संकल्प वाला, मुझमें अर्पित मन और बुद्धि वाला है, वही मेरा भक्त है।
आगे कहते हैं –
यस्मान्नोद्विजते लोक:
लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगै: मुक्त:
य: स च मे प्रिय:।।15।।
अनपेक्षः शुचिः दक्ष:
उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी
यो मद्भक्त:स मे प्रिय:।।16।।
अर्थात् जिससे कोई जीव क्षुब्ध नहीं होता तथा जो स्वयं भी किसी जीव से क्षुब्ध नहीं होता, जो हर्ष -ईर्ष्या, भय-क्षोभ आदि से सर्वथा रहित है, वह मुझे प्रिय है।
किसी की अपेक्षा-उपेक्षा से शून्य, वाह्याभ्यन्तर पवित्र, कुशल, तटस्थ ,व्यथा शून्य,सभी कर्मों में कर्तापने के अभिमान से रहित है, वह मेरा प्रिय है।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि
न शोचति न कांक्षति।
शुभाशुभ-परित्यागी
भक्तिमान् य:स मे प्रिय:।।17।।
जो इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट आगमन से कभी प्रसन्न नहीं होता, किसी वस्तु-व्यक्ति द्वेष नहीं करता, अनिष्टानिष्ट की प्राप्ति-वियोग में शोक नहीं करता, अप्राप्त वस्तु-व्यक्ति की इच्छा भी नहीं करता, शुभाशुभ कर्मों के फलों का समग्र त्याग करनेवाला है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
अन्तिम दो श्लोकों में उपसंहार करते हैं-
सम:शत्रौ च मित्रे च
तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु
सम:संगविवर्जित:।।18।।
तुल्यनिन्दात्मस्तुतिर्मौनी
सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेत:स्थिरमति:
भक्तिमान्मे प्रियो नर:।।19।।
अर्थात् जो शत्रु-मित्र को समान आदर देना वाला, मानापमान में समान भाव वाला, शीतोष्णसुख
और दुखों में एक जैसा, सारे सांसारिक पदार्थों में अनासक्त, निन्दा-स्तुति काल में समान रहने वाला ,किसी भी वस्तुस्थिति में सन्तुष्ट रहनेवाला,निवास स्थान में ममता आकर्षण से शून्य, निश्चल बुद्धि से मेरा भजन करनेवाला, मनुष्य मुझे प्रिय है।
इस प्रकार हर परिस्थिति में सन्तुष्ट ,संसार में रहकर भी संसार भाव से असंग रहनेवाला,भगवान् की समस्त समष्टि में उन्हें देखकर व्यवहार करनेवाला मनुष्य भगवान् को प्रिय है।वही सच्चा भक्त है, क्योंकि उसका भजन-पूजन सांसारिक वस्तु-व्यक्ति के लिये नहीं होता।अभ्यास और भगवत् कृपा से ऐसी स्थिति प्राप्तव्य है।
।।हरिश्शरणम्।।