ज्योतिष एवं मनुष्य

वेद हमारे ऋषियों की तप:प्राप्त चेतना के ब्रह्माण्डीय ज्ञान के आधार हैं। वैदिक ऋषियों को वेदमंत्रों का द्रष्टा कहा गया है, स्रष्टा नहीं-ऋषियो मन्त्रद्रष्टार:
इन वेदों ने मानव सभ्यता का संवाहक बन भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक सभ्यता को ज्ञान के आलोक से ऐसा मार्ग दिखाया है, जिससे मानव मात्र के समग्र कल्याण का पथ प्रशस्त किया।
वेदों के साथ उनके छ:अंगों का भी बड़ा महत्व है।शास्त्रज्ञ जनों के अनुसार- छन्द:शास्त्र, कल्पशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, निरुक्त, शिक्षाऔर व्याकरण, इन्हीं को क्रमशः वेद के पैर, हाथ, नेत्र, कान ,नासिका तथा मुख कहा गया है।
इस प्रकार देखें तो वेद अर्थात् वेदार्थ जानने के लिये उक्त अंगों का ज्ञान आवश्यक है।
इसके छ:अंगों में से एक अंग ज्योतिष शास्त्र है।इसके द्वारा हम समग्र ब्रह्माण्ड पर पड़ने वाले सूर्यादि ग्रहों और नक्षत्रों के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।
इस शास्त्र के दो पक्षों में से गणितपक्ष सम्पूर्ण जगत् की काल गणना का मौलिक आधार है।पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों पर होनेवाले प्रभावों को इसी के द्वारा आनुमानिक दृष्टि से जाना जाता है।
दूसरे शब्दों में प्रकृति या सृष्टि के सभी अंग-प्रत्यंग परस्पर जुड़े होने से एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।परस्पर आदान-प्रदान ही ब्रह्मांड की संतुलित लयबद्धता का मूलाधार है।
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की समस्त क्रिया-प्रक्रिया भी जानी जाती है।हमारी अवधारणा में किसी ग्रहादि में कृपा-कोप का कोई भाव नहीं होता,वे केवल धनात्मक-ऋणात्मक किरणें उत्सर्जित करते हैं।
मानव जाति को ये कोई लाभालाभ नहीं पहुँचाते, बल्कि उसके द्वारा अतीत में किये गये कार्य-कारण का सन्तुलन स्थापित करने के लिए वाह्य स्तर पर एक कार्यप्रणाली का विधिवत् माध्यम प्रस्तुत करते हैं।
जातक ऐसे दिन और समय में पैदा होता है, जब ग्रहनक्षत्रों की किरणें उसके पूर्व शरीर के कर्मों के साथ सम्पूर्ण तालमेल बैठाती हैं।उसकी जन्मकुण्डली उसके अतीत के कारणों के द्वारा संभावित अपरिवर्तनीय परिणामों को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण आलेख होता है।किन्तु जन्मकुण्डली का सही प्रतिफलन केवल अन्त:प्रज्ञा से सम्पन्न व्यक्ति ही प्रस्तुत कर सकते हैं।और ऐसे लोग नगण्य हैं।
जन्म के क्षण में अन्तरिक्ष में स्पष्ट हो जाने वाले आदेश/प्रत्यादेशों का लक्ष्य, गत कर्मों(प्रारब्ध)के फलों को अति महत्व नहीं देना है।वरन् विश्व नियमोंके इन बन्धनों से मुक्ति हेतु मनुष्य की इच्छा शक्ति को को जगाना है।
ज्योतिष शास्त्र के प्रति अन्धश्रद्धा व्यक्ति को यन्त्र की तरह बना देती है जो अपने हर कार्य के लिए यांत्रिक मार्गदर्शन का दास बन जाता है।
जबकि विवेकवान् व्यक्ति सृष्टि(प्रकृति)के बदले स्रष्टा(प्रकृति के अध्यक्ष परमात्मा)में अपनी निष्ठा रखकर अपने ग्रहों के आगामी फलों को परिवर्तित कर सकता है।शनैः शनैः जितना अधिक परमात्मा के साथ अपनी एकात्मता का उसे बोध होता है, उतना ही अधिक प्रकृति का उस पर प्रभाव कम होता है।
आत्मा सदैव मुक्त है, वह अमर है वह अजन्मा है।
उस पर ग्रहादि शासन नहीं कर सकते।
जब मनुष्य यह जानने में समर्थ हो जाता है कि वह आत्मा है, शरीर नहीं, तब वह ग्रह नक्षत्रों के विवशताकारी योगों कुयोगों को पीछे छोड़ देता है।
जब तक आत्मिक विस्मति की साधारण अवस्था में वह किं कर्तव्य विमूढ बना रहता है, तभी तक प्रकृति के विधि नियम की सूक्ष्म जंजीरों में बँधा रहता है।
ईश्वर तो स्वयं सामंजस्य है, उसके साथ अपना सुर मिलाने पर, मनुष्य कोई अनुचित क्रिया कलाप नहीं करेगा, बल्कि उसके सारे कार्य ही ज्योतिषीय नियमों के अनुकूल सही समय पर होंगे।
गहन प्रार्थना और ध्यान के बाद वह स्वयं की दिव्य चेतना के सम्पर्क में आ जाता है ,और आन्तरिक सुरक्षा के बढ़कर अन्य कोई शक्ति नहीं, जो उसके अन्तस् में विद्यमान है।
” कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूँढ़ै
वन माँहिं ऐसे घट घट राम हैं ,
दुनियाँ देखै नाहिं। ”
नारायण! यदि पूर्व शरीर से ही, सब कुछ अन्तिम रूप से विनिश्चित हो जाता है, तब बाबा को यह कहने की जरूरत क्यों होती, कि –
” भाविउ मेटि सकैं त्रिपुरारी ”

।।हरिश्शरणम्।।

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अविनाशी जीव का भ्रम

परमात्मा अविनाशी हैं, अतः उनका अंशभूत जीव भी अविनाशी है- ” अविनाशि तु तद् विद्धि ” गीता-2/17 ।
किन्तु समस्या ये है कि अविनाशी होकर भी नाशवान् शरीर -संसार के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है-
ममैवांशो जीवलोके
जीवभूतः सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15/7।।

अर्थात्-इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा स्वयं मेरा ही सनातन अंश है।परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है अर्थात् अपना मान लेता है।
इस प्रकार अपनी बुद्धि से आत्मा का तादात्म्य प्राप्त कर चेतन ,अचेतन जड प्रकृति से आकृष्ट हो माया वश शरीरों को धारण करता रहता है ।
सुख प्राप्ति की कामना से स्वयं ” सुखराशी” दुखराशी प्रकृति के गुणों से आकर्षित होकर भटकता रहता है।
दु:खरूप संसार के साथ मैं-मेरे पन का सम्बन्ध मानकर ही जीव दु:खी होता है।शरीर संसार से थक हार कर जब, इन सुखाभासों से सम्बन्ध विच्छेद होता है, तब आत्यंतिक सुखानुभूति होने लगती है-

स ब्रह्मयोग-युक्तात्मा
सुखमक्षय्यमश्नुते।।5/21गीता।।
जैसै घर में पारस होते हुए भी कोई द्वार-द्वार जाकर भीख माँगे,ऐसे ही चेतन अमल सहज सुखराशी सांसारिक भोगसंग्रह में लग कर, फल रुप में दु:ख प्राप्त करता है-‘परिणामे विषमिव’ (गीता18/38)।
सुखाभासी सुख में संलग्न मनुष्य हमेशा भ्रम में रहकर दुखराशी बना रहता है।संसार में विद्यमान अन्यान्य लम्पटों, छद्मवेशी धार्मिकों, और वासना वासित कपटमुनिवेश धारकों के प्रति अन्ध श्रद्धाकृष्ट होकर परिवार ,समाज और स्वयं का नाश करता है।
ऐसे लोगों को पहचान कर उनसे विरत रहने की आवश्यकता है ।गोस्वामी जी ने इस कलिकाल में ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिये ही मानस के उत्तर कांड में कुछ बातें कहीं हैं।उन्हीं का उल्लेख कर इस प्रकरण को विराम दिया जा रहा है-
मिथ्यारंभ दंभरत जोई।
ता कहु सन्त कहै सब कोई।।
सोइ सयान जो पर धनहारी।
जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।
जो कह झूँठ मसखरी नाना।
कलजुग सोइ गुनवन्त बखाना।
निराचार जो श्रुतिपथत्यागी।
कलिजुग सोइ ग्यानी सो विरागी।।
जाके नख अरु जटा विशाला।
सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।
अशुभ वेशभूषन धरे,
भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी ते सिद्ध नर
पूज्य ते कलिजुग माँहिं।।
जे अपकारी चार
तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मनक्रम बचन लबार
तेइ बकता कलिकाल महुँ।।
गुरु सिख बधिर अंधकर लेखा
एक न सुनै एक नहिं देखा।।
हरै शिष्य धन शोक न हर -ई
सो गुरू घोर नरक मह पर-ई।
पर त्रिय लंपट कपट सयाने।
मोह द्रोहममता लपटाने।।
ते अभेद बादी ग्यानी नर।
मैं देखा चरित्र कलिजुग कर ।

कलिमल ग्रसे धर्म सब,
लुप्त भये सदग्रन्थ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि
प्रगट किये बहु पंथ।।

इसलिये ऐसे मिथ्याचारियों से सावधान रहें।

।।हरिश्शरणम्।।

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आशा त्याग करना पड़ेगा

आशा अर्थात् विषयाशा तो विष के समान अवश्य ही त्याज्य है।इसी कारण मन अनेकाग्र रहता है ।क्योंकि एक आशा की पूर्ति हो जाने पर, दूसरी उपजती है और दूसरी के पूरा होते ही, तीसरी आ खड़ी होती है।ऐसे ही यह क्रम निर्बाध चलता रहता है, कहीं भी विश्रांति या विश्राम नहीं है।

” आशा ” शब्द की निष्पत्ति संस्कृत की “आस् ” धातु से है,जिसका अर्थ है बैठना, स्थिर होना।
आस्यते आस्थीयते (संसार-
शरीरादौ मन:)अस्याम् इति आशा ।
जिस(शरीर संसार)में मन ,वचन कर्मादि से स्थिर/स्थित , होता जाये, वह आशा है।

दूसरे शब्दों में मन ,जब जीवनान्त सांसारिक भोग्य पदार्थों में स्थित रहकर, उसकी पूर्ति में सतत प्रयत्नशील हो, तब ऐसी मनोदशा ” आशा ” है।तात्पर्यत: विषयों को आसन देकर बैठा लेना आशा है।
इस ” आशा ” को भर्तृहरि ने अपने वैराग्य शतक में एक नदी का नाम दिया है।जिस नदी में मनोरथ का जल भरा हुआ है।उस जल में अप्राप्य तृष्णा की आकुल तरंगें हिलोरें ले रही हैं।अभीष्ट पदार्थ के प्रति प्रेमराग रूप घड़ियाल-मगरमच्छ घूम रहे हैं। अमुक अमुक वस्तु कब मिलेगी, ऐसे तर्क-वितर्क रुप पक्षी-गण उस नदी में विहार कर रहे हैं।यह धैर्य रूपी वृक्ष को अपनी लहरों से उखाड़ फेंकती है।मोह की भयंकर भँवरियाँ, जिसमें बराबर उठ रही हैं तथा उँची-उँची चिन्ताओं के दुस्तर तट के मध्य, जो आशा नदी बह रही है, उससे पार पाना बहुत कठिन है।इसके पार वही जा सकते हैं, जो विशुद्धान्त:करण वाले योगी हों।अतः आशा त्याग श्रेयस्कर है-

आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरंगाकुला
रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी।
मोहावर्तसुदुस्तरातिगहना
प्रोत्तुंगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो
नन्दन्ति योगीश्वरा:।।10।।

इसीलिए आचार्य शंङ्करने अपने “अपरोक्षानुभूति” में गुरू देवता की भक्ति से मन की परिपक्वता पर जोर दिया है ,जिससे प्रत्यक्ष परमानुभूति सिद्ध होती-
परिपक्वं मनो येषां
केवलोयं च सिद्धिद:।
गुरुदैवतभक्तानां
सर्वेषां सुलभो जवात् ।।144।।

और मानव तन के लिये तो ऐसी विषयाशा करना, अमृत छोड़ कर विष ग्रहण करने जैसा है।
कलिकलुषनाशनावतार बाबा तुलसी के शब्दों से यह प्रकरण पटाक्षिप्त हो रहा है-

नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/26/आशा-त्याग-करना-पड़ेगा/

निद्रा समाधि है

संस्कृत लक्षणग्रन्थों के अभिनव व्याख्याकार तन्त्रज्ञ अभिनवगुप्त पादाचार्य ने भगवान शिव की एक स्तुति की है।स्तुति के अनुसार-आत्मा शिव, मति शिवा, सहचारी प्राण, शरीर गृह, विषय सामग्री पूजा, निद्रा समाधि,पदसंचार प्रदक्षिणा, सारे शब्द स्तोत्र यहाँ तक कि जो -जो कर्म सम्पादित हो रहे हैं, वे सभी शिव की स्तुति ही हैं।

आत्मा(शिव)से बुद्धि(शिवा)का तादात्म्य होना अहं ब्रह्मास्मि की अवधारणा का पोषण करने वाला है।शरीर संचार हेतु प्राणादि वायु हैं।शरीर मे आत्मा का अधिष्ठान होने से वह आत्मा का घर है।विषयों से ईश्वरीय पूजा निरन्तर हो रही है ।और निद्रावस्था ही समाधि की अवस्था है।
शरीर की सामान्य रूप से तीन अवस्थायें हैं- 1-जाग्रत्
2-स्वप्न और 3-सुषुप्ति ।

अद्वैत वेदान्त की प्राथमिक पुस्तक ” वेदान्तसार “के कर्ता सदानन्द योगीन्द्र ने इस सुषुप्ति की चर्चा करते हुए कहा-” सुखमहम् अस्वापम् ” अर्थात्
जागरण(काल) अवस्था में हम कहते हैं ,मैं सुखपूर्वक सोया ।
यहाँ उक्त ” मैं ” ही आत्मा है।

इस समय शरीर तो अनेक इन्द्रियों सहित सोया रहता है, किन्तु असंगी आत्मा जाग्रत् काल में आभास कराता है, वह त्रिकालाबाधित सर्वसाक्षी था, शरीर के शयन का।
स्वप्नावस्था तो संसार के प्रपंच की तरह असद् ही है।
जाग्रत् काल में भी असत्प्रपंच ही भासता है।
इस प्रकार निद्रा काल में अनुभूत सुखशयन का बोद्धा ही असंगी ” आत्मा ” सिद्ध हुआ।
इस सम्बंध में यह भी ध्यान देने योग्य है कि, वह स्त्री शरीर था अथवा पुरुष शरीर यह भी भान नहीं होता।अतः उस “आत्मा ” का गुणों से परे होना और स्त्री-पुरूष भिन्न नपुंसक लिंगस्थानी ” ब्रह्म “सत्ता मात्र भी स्वत: सिद्ध होता है।

आचार्य शङ्कर ने अपने ग्रन्थ
” अपरोक्षानुभूति ” में उपर्युक्त बिन्दु से हटकर अवस्था त्रय को गुणोद्भूत मानते हुए वर्णन किया है-
यथैव व्योम्नि नीलत्वं
यथा नीरं मरुस्थले।
पुरुषत्वं यथा स्थाणौ
तद्वद् विश्वं चिदात्मनि।।
।।61।।

जिस प्रकार आकाश में नीलता, मरुस्थल में जल और ठूंठ में पुरुष की प्रतीति होती है उसी प्रकार चेतन आत्मा में विश्व भासता है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/22/निद्रा-समाधि-है/

भगवत् प्राप्ति में सभी का अधिकार

गीता के नवम अध्याय में भगवान् ने अर्जुन से एक प्रतिज्ञा कराई है कि ,” हे अर्जुन तुम संकल्प करो कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता”। इसमें आश्चर्य होता है कि उपदेष्टा भगवान् स्वयं प्रतिज्ञा नहीं करते, बल्कि अर्जुन से कराते हैं।फलितार्थ ये है कि भगवान् लोकहित में अपनी प्रतिज्ञा तो अवश्य तोड़ते हैं, किन्तु भक्त के संकल्प की सर्वविध रक्षा करते हैं।
भगवान् अंशी हैं और भक्त उनका अंश(ईश्वर अंश जीव अविनाशी।चेतन अमल सहज सुखराशी।।)अंश अपने अंशी के स्वरुप को प्राप्त हो तो यह उसकी स्वाभाविकता है।
उसे अपने अंशी से अभिन्न होना चाहिए, किन्तु नाना जन्मों के नाना शरीरों के प्रारब्ध वशात् वह भटकता रहता है लेकिन ज्यौं ही उसकी बुद्धि इस निश्चय पर पहुँचती है, कि संसार के भोग्य पदार्थों के भोग करते रहने पर एक के पूर्ण होने बाद दूसरे भोग आपतित हैं और
लिप्सा और अधिक बलवती होती जा रही है अतः मुझे तो कुछ ऐसा चाहिए जिसके बाद कोई कामना ही शेष न रहे।
अन्ततः ऐसी दृढ निष्ठा आती भी इसीलिए है किअंशी परमात्मा, चेतन, अमल और सहजसुखराशि है तो अंश भी तत् स्वभावापन्न ही होगा समय चाहे जो लग जाय।
इसीलिये भगवान् कहते हैं कि कोई पूर्व जन्मों में कितना बड़ा पापकर्मा हो,उसे उतनी ही सहजता से भगवत् प्राप्ति होगी जितनी की एक धर्मात्मा को बशर्ते उसकी धर्म वृत्ति प्रवृत्ति उद्भूत हो जाये।वह देह और आत्मा को पृथक् देखना आरम्भ करता है तो अंशी से उसकी अभिन्नता संकल्पबद्ध होती जाती है और मुक्ति मार्ग प्रशस्त होता जाता है।इसलिए कहते हैं-

अपि चेत् सुदुराचारो
भजते माम् अनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः
सम्यग् व्यवसितो हि स:।।30।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा
शश्वत् शान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि
न मद्भक्तः प्रणश्यति।।31।।

अर्थात् यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव यानी कि क्रमशः अंशी-अंश-परमात्म -जीव के आधाराधेय सम्बन्धत्वेन अभिन्न भाव से मत्परायण होकर मुझे सतत भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है।क्योंकि वह सम्यक् (भलीभाँति)व्यवसित
(यथार्थ निश्चयी)है।
इसीलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शश्वत्(नित्य स्थायी)शान्ति को प्राप्त कर लेता है।तुम संकल्प कर लो कि मेरे भक्त का नाश(पतन) नहीं होता।
मानसकार के शब्दों में-
सनमुख होइ जीव मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
मतलब कि भगवान् के सन्मुख
(शरणागत)होते ही , भक्त के कोटि-कोटि जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है और तत्क्षण भगवत् प्राप्ति भी ध्रुव हो जाती है।
इस प्रकार भगवत् प्राप्ति में
पापात्मा, दुरात्मा, स्त्री-पुरूष
उच्च-नीच कुलादि का कोई भेदभाव नहीं है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/19/भगवत्-प्राप्ति-में-सभी-का/

कर्म का हेतु

गीता के अठारहवें अध्याय में भगवान् ने कर्म के हेतु भूत रहस्यों की चर्चा की है। दूसरे अध्याय में सबसे पहले”कर्मणि एव अधिकार: ते” का उपदेश करते हुए मानव-मात्र को कर्म में स्वतंत्र बताया है।मानवेतर जातियाँ भोगमात्र योनियाँ सिद्ध हैं।अन्ततः मानव ही भोग के साथ, कर्माधिकार प्राप्त सिद्ध होता है।
आगे चलकर “मोक्षसन्यास”
योग के अन्तर्गत (1) अधिष्ठान
अर्थात् परमात्मा(2)कर्ता अर्थात् व्यक्ति(3)करण अर्थात्
मन,बुद्धि, अहंकार-इन्द्रियादि
(4)विविध पृथक् चेष्टाएँ अर्थात्
अंगसंचालनादि ,संकल्पविकल्पादि (5) दैव अर्थात् भाग्य ,प्रारब्ध या अदृष्ट
ये सभी पाँचों मिलकर सभी मानवीय कर्मों के कारण होते हैं।
इन्हें मनुष्य , शरीर-मन-वचन
से करता है।
इन कर्मों ,न्याय्य(शास्त्र विधि
से किये हुए शुभ) अथवा इसके
विपरीत ,शास्त्रविधिहीन अशुभ
सभी में, जो केवल अपने को
(आत्मा को)ही कर्ता मानता है,
वह अकृतबुद्धि वाला है।वह अज्ञानी मलिन बुद्धि के कारण
यथार्थ सत्य को नहीं जानता।

अधिष्ठानं च कर्ता
करणं च पृथग् विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा
दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।
शरीरवाङ्मनोभि:
यत्कर्म प्रारभते नर:।
न्याय्यं वा विपरीतं वा
पञ्चैते तस्य हेतव:।
तत्रैवं सति कर्तारम्
आत्मानं केवलं तु य:।
पश्यति अकृतबुद्धित्वात्
न स पश्यति दुर्मति:।।
18/14,15,16

सत्संग एवं शास्त्रों के अभ्यास द्वारा तथा विवेक-विचार और शमदमादि आध्यात्मिक साधनों द्वारा, जिनकी बुद्धि शुद्धि नहीं होती है- ऐसे प्राकृत अज्ञानी मनुष्य को ” अकृतबुद्धि ” कहते हैं अतः, यहाँ “अकृतबुद्धित्वात्”
पद से कर्ता मानने का हेतु बताया गया है।अभिप्राय यह है कि समस्त कर्मों की पूर्णता में
उपर्युक्त अधिष्ठानादि ही पाँच कारण हैं।
असंगी आत्मा का उन पाँचों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं।अतः भगवदुक्त उपर्युक्त पाँचों को कर्मों के कारणस्वरूप समझते हुए कर्मों में प्रवृत्त होने पर मुक्तपथ प्रवृत्ति होगी।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/18/कर्म-का-हेतु/

तृष्णा क्षय का सुख सर्वोत्तम

सनातन भारतीय परम्परा में त्याग को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृध: कस्य स्विद् धनम्” की ईशोपनिषद की अमरवाणी युगों से यही सन्देश दे रही है।
यह त्याग भाव मानव प्राणी के ही मन में उल्लसित होता है, यह भी निर्विवाद है।इस त्याग की प्रथम और अन्तिम भित्ति सारी लोकालोक कामनाओं का ही त्याग माना गया है।कामनाओं के त्याग का अपर नाम तृष्णाओं का क्षय या विनाश है।
तृष्णा क्षय का सुख इह लोक और परलोक के लौकिक-स्वर्गिक सुख के सोलहवें भाग की भी बराबरी नहीं कर सकता।महाभारत में व्यासवाणी है-
यच्च कामसुखं लोके
यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्य एते
नार्हत:षोडशीं कलाम्।।

योगी भर्तृहरि अपने प्रसिद्ध नीतिशतक में ऐसी बातें का उल्लेख करते दीखते हैं-

प्राणघतान् निवृत्ति:(अहिंसा) ,परधनहरणे संयम:(अपरिग्रह),सत्यवाक्यम् (आत्मा में आगत बात का उद्घाटन तद्रूप उद्घाटन),काले शक्त्या प्रदानं( मुक्तहस्त दान),
युवतिजनकथामूकभाव:परेषां(कामिन-कांचन से परहेज),तृष्णास्रोतोविभंग:(ईश्वर प्राप्ति के अतिरिक्त कोई और कामना न होना),गुरुषु च विनय:( बडों का आदर),सर्वभूतानुकम्पा(सभी प्राणियों पर दया),सर्वशास्त्रेषु अनुपहतविधि:(सारे शास्त्रों का ज्ञान)श्रेयषामेष पन्थाः( ये सब परम श्रेयस् मार्ग है)।

इसी नीतिशतक में “तृष्णां छिन्धि”और आगे वैराग्य शतक में तो तृष्णा को पाप-परायण, हमेशा असन्तुष्ट रहने वाली कह कर धिक्कारते हैं-

तृष्णे! जृम्भसि पापकर्मपिशुने!
नाद्यापि सन्तुष्यसि।।02।।

इस प्रकार इस तृष्णा की भर्त्स्ना करने वाले भगवान् व्यासदेव हों या योगी भर्तृहरि सभी लोग इसके त्याग को मानवजीवन का निहितार्थ एक स्वर से स्वीकारते हैं।
स्वनामधन्य कबीर दास इसके त्याग के विना ” पुनि पुनि जननी -जठरे शयनम्” की शंङ्करोक्ति
का प्रबल उद्घोष करते दीखाई देते हैं-
माया मरी न मन मरा,
मर मर गए शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर।।

अस्तु, आज जब देश की आजादी का इकहत्तरवाँ वर्ष, मनाया जा रहा है ,हम पाश्चात्य संस्कृति और भाषा के प्रति अपना राग सँजोए सुखाभास में जी रहे हैं, यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि,” हम क्या से क्या हो गए “।
त्याग और तप की प्रतिमूर्ति हमारे ऋषियों का उद्घोष, जो “तैत्तिरीय उपनिषद्” को माध्यम बना कर अवतरित हुआ है ,की “दैवी वाक्” से इस चर्चा को किंचिद् विराम दिया जा रहा है-

उपनिषद् की ब्रह्मानन्द वल्ली में आनन्द की मीमांसा की गई है।जिसका आशय यह है, कि मानव से लेकर ब्रह्मा तक के सारे आनन्द “वेदज्ञ और कामनाओं से आहत न होने वाले” व्यक्ति को स्वत:प्राप्त हैं।
इस व्याख्यान में एक से बढ़कर एक बारह आनन्दाप्त व्यक्तियों की चर्चा क्रमशः इस प्रकार की गई है, जोकि कामनाओं से अनाहत मनुष्य के लिये तुच्छ है-

(1)धरती के अधिपति मानव का आनंद(2)मनुष्य गन्धर्व का आनंद(3)धेवगन्धर्व का आनंद(4)दिव्य पितृलोकस्थ पितरों का आनंद(5)चिरस्थायी पितृलोकस्थ पितरों का आनंद(6)आजानज देवलोकस्थ देवों का आनंद(7)कर्म देवों का आनंद(8)देवों का आनंद(9)इन्द्र का आनंद(10)बृहस्पति का आनंद(11)प्रजापति का आनंद(12)ब्रह्मा का आनंद।
इन क्रमश:उत्तरोत्तर वर्धमान आनन्दों की हेयता तुच्छता है ,अकामहत व्यक्ति के समक्ष।
अतः” जयदेवोक्ति”- “विगत-विषय-तृष्ण: कृष्णमाराधयामि”
ही श्रेयस्कर है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/08/16/तृष्णा-क्षय-का-सुख-सर्वोत/

आत्मज्ञान का मूल मनोनिग्रह

इस मानव शरीर में पांच शरीर हैं।मन वाला शरीर सबके मध्य में है।इस मनोमय शरीर के पहले-स्थूलाकृति स्थूल शरीर और सूक्ष्माकृति पंच प्राण शरीर ,ये दो शरीर हैं।मध्यस्थ मनोमय के पश्चाद्वर्ती भी दो शरीर हैं-विज्ञानात्म(जीवात्मा)और आनन्दात्म(परमात्मा)जोकि सूक्ष्मतम हैं।
इस प्रकार एक स्थूल+सूक्ष्म पूर्व में और बाद में सूक्ष्मतम+
सूक्ष्मतम शरीरों का मध्यवर्ती है , मन वाला शरीर, जोकि स्वयं में भी अपने पश्चाद्वर्तियों
की ही तरह सूक्ष्म है।
यही मनोमय सारी भ्रान्ति और समग्र शान्ति का भी कारक होता है। बिना मनोयोग के कोई भी लौकिकालौकिक प्राप्ति सम्भव नहीं है।
एक योगी की बात इसके बारे में इस प्रकार है-
“मन ही मांस पेशियों को नियंत्रित करता है।जैसै हथौड़े के आघात की शक्ति उस पर लगाये गये बल पर निर्भर करती है, वैसे ही मनुष्य की शारीरिक शक्ति की अभिव्यक्ति उसकी आक्रामक इच्छा शक्ति की तीव्रता और साहस पर निर्भर करती है।
मन ही अक्षरशः शरीर का निर्माण करता है और वही उसे जीवित भी रखता है।गत जन्मों(शरीरों)की प्रवृत्तियों की प्रबलता के अनुसार अच्छे या बुरे स्वभाव गुण धीरे-धीरे मानव-चेतना में उतरते हैं।
यही स्वभाव गुण आदतों में ढल जाते हैं और ये आदतें फिर एक वांछनीय या अवांछनीय शरीर के रूप में प्रदर्शित होती हैं।
वाह्य दुर्बलताओं की जड़ में मन होता है और आदतों से लाचार शरीर ,मन अवहेलना भी करता है।इस प्रकार यह कुचक्र चलता रहता है।
समझने की बात है कि, यदि मालिक, नौकर की आज्ञा का पालन करने लगे तो नौकर निरंकुश स्वेच्छाचारी बन जाता है।इसी प्रकार, मन भी शरीर की आज्ञाओं का पालन कर -कर के उसका दास बन जाता है।”
आत्मानुभूत एक सिद्ध योगी की ऐसी बातें, यह भी सिद्ध करती हैं योगीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने” मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:” क्यों कह दिया था।
अतः वायु के समान सुदुष्कर बांधने योग्य मन को उन्हीं भगवदैक-चरण-शरण होकर ही बड़ी सहजता सरलता से अन्यज्जन्म कारण होने और भटकने से बचाया जा सकता है।
सारे पूजा-पाठ,दान-धर्म- कर्म,यम-नियम, शास्त्राध्ययन
तीर्थाटन और उत्तमोत्तम व्रतों का अन्तिम फल मन को भगवत् चिंतन में एकाग्र करना ही है।यह बात उद्धवजी के लिये भगवान् ने श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में कही हैं।
आज उन्हीं लीलापुरुषोत्तम के प्राकट्योत्सव के अवसर पर,
तुभ्यमेव समर्पये की धारणा से, उनकी बात कहकर वाणी को विराम दिया जा रहा है-
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च,
श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता:
परं हि योगो मनस:समाधि:।।
-श्रीमद्भागवत: एकादशस्कन्ध।

।।हरिश्शरणम्।।

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परमात्म -दृष्टि

भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म की दृष्टि में इस मानव शरीर को पञ्च कोशों वाला बताया गया है।आदि शङ्कर ने बड़े विस्तार से इसे समझाया है।स्थूल परिदृश्य अन्नशरीर में सूक्ष्म रूप से पंच प्राणात्मक शरीर की स्थिति है और इस प्राण शरीर में तृतीय स्थानीय मनोमय शरीर रहता है, जिसके बाद चतुर्थ स्थानी विज्ञानात्मा(जीवात्मा)और पंचम स्थानी आनन्दात्मा(परमात्मा)विद्यमान है।
पाँचों शरीरों में प्रायः प्राणियों की दृष्टि गत दृढता अन्नशरीर के स्थूल स्वरूप तक ही रह जाती है।लेकिन देवदुर्लभ मनुष्य शरीर में आकर हमें इसके आगे भी सूक्ष्म और सूक्ष्मतर मन-आत्मा-परमात्मा के बारे में भी सोचना चाहिए।यह स्थूल शरीर अहर्निश मृत्यु मुख की ओर अग्रसर है, किन्तु पूर्व शरीरों का प्रारब्ध भोग कहें या अनादि “वासना” हम द्वारस्थ मृत्यु से अचेत,अहमिदं बुद्धि कारणों से
अन्य शरीर की यात्रा पर चले जाते हैं।
अत:आचार्य ने विवेकचूडामणि में मानव जीव को सावधान रहने का निर्देश दिया है-

शवाकारं यावद्भजति
मनुजस्तावदशुचि:
परेभ्य:स्यात् क्लेशो
जननमरणव्याधिनिलय:।
यदात्मानं शुद्धं कलयति
शिवाकारमचलं
तदा तेभ्यो मुक्तो भवति
तदाह श्रुतिरपि।।397।।

अर्थात्-जब तक मनुष्य इस मृतक-तुल्य देह में वासनासक्त रहता है, तब तक तो वह अत्यन्त अपवित्र ही है।
उसे, पर(वस्तु-व्यक्ति-स्थान) से क्लेश और भय प्राप्त होता रहेगा। सुभाषित भी है-
सर्वं परवशं दु:खं
सर्वमात्मवशं सुखम्।
अतः इन कारणों से वह जन्म मरण-जरा-व्याधियों के दुश्चक्र में पड़ा ही रहता है।
लेकिन ज्योंही अपने (आत्म)को शिवाकार ,अचल और शुद्ध ,जान लेता है, उसी क्षण सारे बन्धनों, क्लेशों से मुक्त हो जाता है।
ऐसी स्थिति प्राप्त करने हेतु अनादि शरीर वासना से दूर होना पड़ेगा, जोकि वैराग्य की वैराग्य की चरमावस्था है।
चित्त में अहंशून्यता , बोध की चरमावस्था है तथा लीन हुई वृत्तियों की पुनरुत्पत्ति न होना “उपरामता” की चरम सीमा है।

वासनानुदयो भोग्ये
वैराग्यस्य परोवधि:।
अहंभावोदयाभावो
बोधस्य परमोवधि:।
लीनवृत्तेरनुत्पत्ति:
मर्यादोपरत:तु सा।।425।।

इसके पहले पद्यों में उन्होंने चित्त शान्ति के कारण आत्मानन्द की अनुभूति बताई है, जोकि “उपरति”का फल है।और यह उपरति वैराग्य से फलित बोध के कारण पाई जा सकती है-

वैराग्यस्य फलं बोधो
बोधस्योपरति: फलम्।
स्वानन्दानुभवात् शान्ति:
एषैवोपरते: फलम्।।420।।

अन्त में योगावतार लाहिड़ी महाशय के “क्रियायोग” की स्वात्मानुभूति दायिनी पीयूष वर्षिणी वाणी से इस प्रकरण का समाहार किया जा रहा है-

” यह याद रखो कि तुम किसी के नहीं हो और कोई तुम्हारा नहीं है। इस पर विचार करो कि किसी दिन तुम्हें इस संसार का सब कुछ छोड़कर चल देना होगा, इसलिए अभी से भगवान् को जान लो।
“ईश्वरानुभूति के गुब्बारे में प्रतिदिन उड़कर मृत्यु की भावी सूक्ष्म यात्रा के लिये अपने को तैयार करो।माया के प्रभाव में तुम अपने को हाड़-मांस की गठरी मान रहे हो, जो दु:खों का घर मात्र है।
“अनवरत ध्यान करो ताकि तुम जल्दी से जल्दी अपने को सर्वदु:ख-क्लेशमुक्त अनन्त परमतत्व के रूप में पहचान सको ।क्रियायोग की गुप्त कुंजी के उपयोग द्वारा देह-कारागार से मुक्त होकर परमतत्व में भाग निकलना सीखो।”

।।हरिश्शरणम्।।

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पञ्च कोश का संघात शरीर

विवेकचूडामणि में आचार्य शङ्कर ने भगवान् की माया से निर्मित संसार की चर्चा की है।इस माया से ही संसार के सभी द्वैतों की सृष्टि और विनष्टि प्रतीत होती है।वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तो समष्टि प्रकृति का ही तिरोभाव हो जाता है और एक अद्वैत परमात्मा अवभासित हो जाता है-
माया मात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थत:।इति ब्रूते श्रुति:साक्षात्सुषुप्तावपि
अनुभूयते।।406।।

इसके पूर्व आचार्य ने शरीर को पाँच कोशों- अन्न-प्राण-मन -विज्ञान और आनन्द के द्वारा निर्मित बताया है,जिनसे आवृत हुआ आत्मा अपनी ही शक्ति से उत्पन्न हुए शैवाल-समूह के द्वारा ढँके हुए बावली के जल की भाँति नहीं भासता-

कोशैरन्नमयाद्यै:पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति।
निजशक्तिसमुत्पन्नै:शैवाल-पटलैरिवाम्बु वापीस्थम्।।151।।

1-अन्नमयकोश-
देहेयमन्नभवनोन्नमयस्तु कोश:
चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीन:।
त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीष-राशि: नायं स्वयं भवितुमर्हति
नित्यशुद्ध:।।156।।

अन्न से उत्पन्न यह दृश्यमान शरीर ही अन्नमय कोश है।यह अन्न से ही जीवित रहता हुआ, उसके बिना, उसी में विलीन हो जाता है।त्वचा, चर्म,मांस, रक्त अस्थि और मलादि संघात वाले शरीर को नित्यशुद्धात्मा नहीं कहा जा सकता।अतः इसमें आत्मबुद्धि त्याग कर सर्वात्मा ब्रह्म(निर्विकल्प)में आत्मत्व जानकर शान्ति पाए-
अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे
त्वङ्मांसमेदोस्थिपुरीषराशौ।
सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे
कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व।।163।।

2- प्राणामयकोश-
कर्मेन्द्रियैः पंचभिरञ्चितोयं
प्राणो भवेत्प्राणमयस्तु कोश:।
येनात्मवानन्नमयोन्नपूर्ण:
प्रवर्ततेसौ सकलक्रियासु।।167।।

चर्मचक्षुओं से दीखने वाले इस अन्नमय शरीर(कोश)में ,सभी जगह व्याप्त रहने वाला प्राणमय शरीर है। यह शरीर पाँच कर्मेन्द्रियों और पाँच प्राणों के संचय से विनिर्मित है।इन्हीं प्राण-अपान-समान-व्यान और उदान की अन्नशरीर में समवस्थिति समग्र शरीर को संचालित करती है। सारी क्रियाओं का जनक यही प्राणमय कोश ही है। इसके विना शरीर का जीवित रहना असंभव है।स्थूलान्नमय शरीर का संचालक होकर भी, यह आत्मा नहीं है,क्योंकि वायुविकार कैसे आत्मा होगा।

3-मनोमयकोश-

ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमय:स्यात्।कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतु:।
संज्ञादिभेदकलनाकलितो
बलीयांस्तत्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते य:।।169।।

यह अपने पूर्व-पूर्व के कोशों अन्न और प्राण को अभिव्याप्त करके अवस्थित है।पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ और स्वयं मन ही मनोमय कोश है।यह सभी के, मैं-मेरा आदि विकल्पों का हेतु है।यह सूक्ष्म रूप से सम्पूर्ण अन्त:वहि:विराजमान होकर नाना नामरूपात्मक जगत् का कारण है।
यही सारी अविद्या का मूल है।
सुषुप्ति कालमें” मैं सुखपूर्वक सोया” ऐसा जागने पर भान होता है।उस सुषुप्ति में मन का विलीनीकरण होने से कुछ भी भान नहीं रहता।अतः यही कोश या शरीर समस्त संसार का सृजन करता है।सारा संसार इसी की कल्पना मात्र है-
सुषुप्तिकाले मनसि प्रलीने
नैवास्ति किंचित्सकलप्रसिद्धे:।
अतो मन:कल्पित एव पुंस:
संसार एतस्य न वस्तुतोस्ति।।173।।
आचार्य ने इसे भयंकर व्याघ्र भी कह दिया, जो विषयरूपी वन में विचरता है।साधक साधु मुमुक्षु वहाँ निश्चय ही न जायें-
मनो नाम महाव्याघ्रो
विषयारण्यभूमिषु।
चरति अत्र न गच्छन्तु
साधव: ये मुमुक्षव:।।178।।

4-विज्ञानमय कोश

अन्न,प्राण और मनोमय शरीर में अत्यन्त सूक्ष्म भाव से सभी को व्याप्त करके रहनेवाला, विज्ञान मय शरीर(कोश)है।इस शरीर में ज्ञान इन्द्रियों के साथ ,वृत्ति युक्त बुद्धि ही कर्तृत्व भाव से विद्यमान रहती है।यह भी मनुष्य के जननादि बन्ध हेतु है-

बुद्धि: बुद्धीन्द्रियै: सार्धं
सवृत्ति: कर्तृलक्षण:।
विज्ञानमय कोश: स्यात्
पुंस: संसार-कारणम्।।186।।

चेतन की ही प्रतिबिंब शक्ति, एक दूसरे शरीर का आश्रय लेकर इन्द्रियादि का अनु-गमन करने वाली होने से विज्ञानमय कही गई है।
अनुव्रजत्चित् प्रतिविम्बशक्ति:
विज्ञानसंज्ञ: प्रकृतेर्विकार:।।187।।
इसी विज्ञानमय की ही जीवात्म-भाव होने से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि त्रिविध अवस्थायें होती हैं-
अस्यैव विज्ञानमयस्य जाग्रत्-
स्वप्नाद्यवस्था: सुखदु:खभोग:।।189।।
अनादिकालोयमहंस्वभाव:
जीव: समस्तव्यवहारवोढा।।188।।
विज्ञानकोशोयमतिप्रकाश:
यदात्मधी:संसरति भ्रमेण।।190।।
इस प्रकार यह विज्ञानमय ,बुद्धि द्वारा आत्मा का अत्यन्त निकट होने से (अनादिकालोयमहं स्व-भावो)अहंकार स्वभावत्वेन जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है।

4-आनन्द मयकोश-

यह आनन्द मय शरीर अपने पूर्व शरीर विज्ञान में अभिव्याप्त है।आचार्य कहते हैं-आनन्द स्वरूप आत्मा के प्रतिविम्ब से चुम्बित एवं तमोगुण से प्रकाशित वृत्ति आनन्द मय कोश है।यह प्रिय, मोद और प्रमोद इन तीन गुणों से युक्त तथा अपने अभीष्ट पदार्थ के पाने पर प्रकट होती है।पुण्य कर्मों के परिपाक से तदनुकूल सुखानुभूति काल में पुण्यशाली लोगों को इसका स्वयं भान होता है।इससे जीव निष्प्रयास अत्यंत आनन्दित होता है-
आनन्दप्रतीविम्बचुम्बिततनु:
वृत्तिस्तमोज्जृम्भिता
स्यादानन्दमय:प्रियादिगुणक:
स्वेष्टार्थलाभोदय:।
पुण्यस्यानुभवे विभाति
कृतिनामानन्दरूपप:स्वयं
भूत्वा नन्दति यत्र साधु
तनुभृन्मात्र:प्रयत्नं विना।।209।।

इसको स्वयंप्रकाश आत्मा, अन्नमयादि पाँचों कोशों में अद्वितीय, जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं का साक्षी,सत् स्वरूप समस्त शरीरों का आत्मा जानना चाहिए-

योयमात्मा स्वयंज्योति:
पञ्चकोशविलक्षण:।
अवस्थात्रयसाक्षीसन्
विकारो निरंजन:।
सत्स्वरुप:स विज्ञेयः
स्वत्मत्वेन विपश्चितता।।213।।

।।हरिश्शरणम्।।

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