गीता माँ

गीता माँ
“भक्तिरसायनकार”
आचार्य मधुसूदन सरस्वती ,जिन्होंने भक्तसमुदाय का “गीतागूढार्थदीपिका”लिखकर महदुपकार किया था, अपने एक लघु कलेवर ग्रन्थ”गीता-
ध्यानम्” से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की।आपने अपने इस ध्यानम् में प्रथम पद्य में गीता को माँ कहा है-पार्थाय प्रतिबोधितां,भगवता नारायणेन स्वयं, व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभरतम्।अद्वैतामृत-
वर्षिणीं भगवतीमष्टा-
दशाध्यायिनीम् अम्ब त्वाम्
अनुसन्दधामि भगवद्-
गीते भव-द्वेषिणीम्।।
साक्षान्नारायण ने जिसका अर्जुन को उपदेश दिया है, जिसे पुरातन मुनि व्यास ने महाभारत के मध्य गूँथा है, जो अद्वैत ज्ञान रुपी अमृत की वर्षा करनेवाली है, जो दिव्य गुणों से सम्पन्न है, जो अठारह अध्यायों वाली है और जो (जन्म)भव की शत्रु है, ऐसी तुझको, हे माँ !
भगवद्गीते ! मैं सतत ध्यान
करता हूँ।
अस्तु ,इसमें “गीता”के लिए
“अम्ब” का सम्बोधन सार-
गर्भित है।सारे नाते छोड़ कर
गीता को माँ कहना बड़ा अर्थ
छोड़ जाता है। संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार, कम या अधिक, छल-कपट,राग-द्वेष
और स्वार्थ प्रेरित होता है, किन्तु माँ का अपनी सन्तान के साथ बर्ताव नि:शेष निरपवाद
रूप से स्नेह ,त्याग, बलिदान, ममता एवं अगाध सहिष्णुता से
परिपूर्ण होता है।सभी व्यक्ति, हमारी दो-चार त्रुटियों के बाद ,जहाँ हमें दण्डित करने लगते हैं, लेकिन माँ, हमारे जघन्य दोषों और नृशंस दुष्कर्मों की अनदेखी कर हमारे सुख स्वास्थ्य के लिए आजीवन कामना करती है।वह औरों को क्षति पहुंचा दे ,स्वयं भी कष्ट उठा ले ,किन्तु अपने बालक पर फूल की चोट भी सहन नहीं करती।माता का हृदय ममता का बना होता है।”पूत कपूत हो,पर माता कुमाता नहीं बन सकती” विषय-विलास-वासना
के विषम पथ पर जन्म-जन्म से भटकते हुए ,अपनी सन्तान को,
कर्म-भक्ति-ज्ञान की संजीवनी से,वह गीता माँ, अवश्य ही
मुक्ति द्वार तक ले जायेगी।

।।हरिश्शरणम्।।

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प्रणव (ओम्)

प्र-प्रकृष्ट रूप से या आत्यन्तिक अन्तिम रुप से,
नव -नवीनतम ,जो है, उसे प्रणव कहते हैं। इसे ही ओम् भी,कहकर सर्वादि सिद्ध किया गया है। यह ओम् या प्रणव पवित्र घोष का अभिव्यंजक है।”शब्दो वै ब्रह्म “की अवधारणा मे यह ब्रह्म है।सृष्टि का आद्यक्षर भी।
वर्णों की दृष्टि से इसमें तीन अक्षरों का समावेश है-अ ,उ तथा म ।इन्हीं का सन्धिगत समष्टिगत रुप ओम् है ।निर्गुण निराकार ब्रह्म का प्रतीक होने के साथ साथ यह सगुण ब्रह्म का भी बोधक है।
अकार विष्णु का प्रतिनिधि(अक्षराणामकारोस्मि)
उकार शिव उन्नति परमोन्नति का प्रतिनिधि और मकार ब्रह्मा का बोधक है ,जिसके द्वारा काल गणना होती है। इस तरह त्रिदेवों के तीनों कार्यों-सृजन, पालन और संहार को भी ओम् सूचित करता है।
इस तरह यह नाम रूपात्मक विश्व का बोधक बन जाता है।संसार के सभी पदार्थों की अभिव्यक्ति वर्णों/अक्षरों से होती है।संस्कृत.ही नहीं सभी भाषाओं के सभी वर्णों और ध्वनियों का उच्चारण स्थान या तो मुख का सबसे भीतरी भाग-कण्ठ – है अथवा सबसे बाहरी भाग ओष्ठ, नासिका।
इसतरह विचार करने पर “अ”का उच्चारण स्थान कण्ठतथा “उ”का ओष्ठ माना गया है। “म” भी ओष्ठ और नासिका से उच्चरित होता है।इस प्रकार समूहालम्बनात्मक दृष्टि से ओम् मे बाहरी/भीतरी दोनों ध्वनियों का समावेश है।
दूसरे शब्दों में ओम् मे सभी के समाहित होने से, उसी मे सभी सांसारिक अभिव्यक्त विषयों, पदार्थों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की समष्टि दृष्टिगत होती है।
वस्तुतः “ओम्’ और ब्रह्म (सगुण, निर्गुण)एक ही हैं।
।।हरिश्शरणम्।।

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गृहस्थ-सन्यास

विश्व के सामने गीता ने बड़ा क्रान्तिकारी विचार रखा है।वह विचार है, “गृहस्थ-सन्यास” ।जहाँ अन्य विचारधाराओं ,मतमतान्तरों ने सन्यासी के लिए घर बार छोडकर वन-पर्वतादि निर्जन स्थानों में चले जाना, उचित माना है, वहीं गीता ने जगत् के धार्मिक-दार्शनिक इतिहास में प्रथम बार,यह चरमोद्घोष किया है कि यह सब नितान्त आवश्यक नहीं है।
साधक का इन्द्रियों को वश में कर ,मन को बुद्धि के अंकुश तले लाकर और पुनः स्थिरधी बनकर अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को पूर्ण ब्रह्म प्राप्ति हेतु केन्द्रित कर देना ही, “सन्यास ” है।यह तो चित्तस्थ एक आन्तर प्रक्रिया है, जिसके साथ जिज्ञासु के देश, वेश,प्रदेश, परिवेश का दूरत: सम्बन्ध नहीं है।
पग पग पर गीता अपने भक्त को स्मरण कराती है कि भय से भागना भीरुता है और प्रबल प्रतिरोध करना, वीरता ।एक सच्चा सन्यासी वह है, जो गृहस्थ कर्मों का पालन करता हुआ कुटिल, कुमति, कृतघ्न कुटुम्बियों के क्रूर कर्म-चक्रवात में भी हिमाचलवत् अचल खड़ा रहे।
कामन-कामिनी-कांचन के करालानल में फंसा हुआ भी ,प्रह्लाद सदृश स्वयं को आंच न लगने दे।
मद-मोह-मात्सर्य के महामकरों से समावृत होकर भी स्वयं ध्रुव धैर्य धारण किए रहे।
विषय-वासना-विलास की वारिधि में वास होने पर भी कमलवत् अप्रभावित रहे।इस प्रकार वानप्रस्थी ही नहीं, गृहस्थी भी असाधारण रूप से, ” सन्यासी ” बनने का अधिकारी है।
समाज के किसी भी क्षेत्र में अपने सांसारिक कर्तव्य का निर्वाह करता हुआ कोई भी व्यक्ति-धनी-निर्धन,स्त्री-पुरूष, ब्राह्मण-शूद्र, बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित सन्यास ग्रहण कर सकता है।नि:सन्देह, गीता का ” गृहस्थ-सन्यास ” सभी के लिये अनुपम वरदान स्वरूप है ।
।।हरिश्शरणम्।।

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पूर्ण -योग

मानव कल्याण की दृष्टि से श्रीमद्भगवद्गीता मे योग को “पूर्णयोग” बनाकर समन्वित स्वरूप मे प्रतिष्ठित किया गया है।वैदिक साहित्य की तरह इसमें भी मुक्ति(मोक्ष)के त्रिविध मार्गों -कर्म, भक्ति और ज्ञान का अनुमोदन किया गया है।किन्तु
पूर्ववर्तियों ने जहाँ तीनों को पृथक्-पृथक् मार्ग मानकर इनमें से किसी एक को भी स्वतन्त्र रूप से लक्ष्य सिद्धि का क्षम साधन मानते हैं, वहां “गीता” किसी एक मार्ग को अलग न मानकर तीनों को एक मार्ग (महामार्ग) के अभिन्न अंग के रूप में देखती है, और यही”पूर्णयोग”है।
कहना न होगा कि एक मार्ग का आश्रयण साधक को अपने निश्चित निर्धारित लक्ष्य से विच्युत कर देगा।समन्वित और पूर्णयोग की यह अवधारणा शुद्ध रूप से जीवन तथ्य पर अवलम्बित है।इस समग्रता के तीन स्तम्भ हैं, जो मानव जीवन की लीला कथा के तीन तत्व हैं-
1-इन्द्रिय (कर्मजनक )
2- मन (भक्तिजनक)
3-बुद्धि (ज्ञानजनक )
वस्तुतः इन तीनों के समुचित और सामूहिक विकास से ही व्यक्तित्व का सम्पूर्ण व सर्वांगीण उत्कर्ष सम्भव है, जिससे कोई व्यक्ति बन सकता है, नहीं तो व्यक्तित्व के बिना कोई व्यक्ति कैसे है,मनुष्यत्व के विना कोई मनुष्य कैसे? इनमेंसे किसी एक की अवहेलना से उसका व्यक्तत्व अधूरा रह जायेगा।
अतः इस इन्द्रिय, मन और बुद्धि की त्रिवेणी के संगम मे पवित्र भावपूर्ण सद्गुरू कृपाधारित “स्नान”मनुष्य को मनुष्य बनाएगा, यही”पूर्णयोग” की त्रिवेणी है।यही ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद् का अनुपम सन्देश है।
।।हरिश्शरणम्।।

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निष्काम कर्म

वेदों का अंकुरित” ज्ञान” ब्राह्मण ग्रन्थों मे पल्लवित, आरण्यकों मे प्रफुल्लित और उपनिषदों मे
प्रबलित हुआ।किन्तु अनेकानेक ऋषियों, आचार्यों, दार्शनिकों एवं धर्मगुरुओं के बहुसंख्य परस्पर विरोधी मतों से आक्रान्त होकर यह विषय सामान्य जिज्ञासु के लिए”चक्रव्यूह”बन गया।ऐसी स्थिति मे, उन सभी पन्थों का
उपसंहार करनेवाली “गीता”
मानव कल्याण का मेरूदण्ड बनी।श्री मधुसूदन सरस्वती जी ने इस प्रक्रिया का बहुत सुन्दर चित्र खींचा,जिसमें सारी उपनिषदें गाय बनी हैं।दूहने वाले “गोपाल” “श्रीकृष्ण” हैं।पृथापुत्र (अर्जुन) बछड़े के रूप मे हैं, तथा गीतामृत ही दुग्ध है।इस प्रकार के मंथन से नव्य मार्ग ने जन्म लिया- सर्वोपनिषदो गावो ,दोग्धा गोपालनन्दन:।पार्थो वत्स:सुधी:भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्।।
नया पथ प्रशस्त करनेवाली
“गीता”ने एक नवीन शब्द दिया
“निष्काम”।इसमे परम्परागत यज्ञ अनुष्ठान आदि सकाम कर्मों से फलित स्वर्गादि अनित्य सुखों की अपेक्षा नित्य (मुक्ति प्रद)कर्मों का समुद्घोष हुआ।जिसके लिए”निष्काम कर्म”शब्द प्रयुक्त किया गया।
तार्किक दृष्टि से कोई कर्म यदि फलाकांक्ष होकर न करें, तो वह कोई फल या वासना उत्पन्न नहीं कर सकता।क्योंकि जैसा कारण वैसा कार्य।
मतलब जब वासनाएं पैदा होना बन्द हो जायेंगी ,तो उन्हें तृप्त करने के लिए नये जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता।और नये जन्म न लेने का तात्पर्य मुक्ति ही है।इस प्रकार जन्म जन्मान्तर के विषयेन्द्रिय जन्य वासनाओं के अनवरत, प्रबल झंझावात से बचकर शान्तिप्राप्ति हेतु “निष्काम कर्म” एक अमोघ दिव्यास्त्र है।
।।हरिश्शरणम्।।

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हरि भक्ति ही मुक्ति का मूल

एक जगह बाबा तुलसीदास ने बड़े साफ शब्दों में कह डाला है- बारि मथे घृत होय बरु ,
सिकता ते बरु तेल
बिनु हरिभजन न भव तरिअ
यह सिद्धांत अपेल।।
मतलब जल को मथने पर घी की प्राप्ति हो सकती है, और बालू को पेरने पर तेल भी
निकल सकता है, किन्तु बिना भगवान का भजन (स्व मे तत् स्वरूपानुसन्धान)किए और किसी भी तरह भवसागर से पार होना असंभव है ।
फिर एक जगह वे कहते हैं-
अब प्रभु कृपा करहुँ एहि भांती
सब तजि भजन करहुँ दिनराती
हे नाथ आप केवल और केवल इतनी कृपा करें कि मैं सब कुछ त्याग कर आपको भजता रहूं अर्थात् आपका विस्मरण क्षणमात्र के लिए भी नहीं हो।
पुनः एक प्रसंग मे बालि से कहवाते हैं-अचल करौं तन राखहुं प्राना ।बालि कहा सुनु
कृपा निधाना।जनम जनम
मुनि जतन कराहीं।अन्त राम
कहि आवत नाहीं।।
तात्पर्य यह है कि भगवान की कृपादृष्टि किसी भी यत्न प्रयत्न के अधीन नहीं है।अन्त काल में भी ,सारे जन्म मे अनेकानेक जन्म मे भी उनकी कृपा यत्नों के अधीन नहीं, वह तो क्षणमात्र मे प्राप्त है,जीव की अन्त:पुकार पर बिना यत्न सुलभ है।
फर्क यही है कि मनसा, वाचा ,कर्मणा निश्छल भाव से सारी चतुराई भूलकर शरणागत होना होगा-
मन क्रम वचन छाड़ि चतुराई
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।

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सत् संग से जीवन्मुक्ति

साधना की दृष्टि से भगवत् कृपा के द्वारा मुक्ति की इच्छा और तदर्थ प्रयत्न तथा सत्संग की प्राप्ति ये तीन दुर्लभ वस्तुएँ हैं।इनसे विवेक प्राप्ति होकर जीवन्मुक्ति की उपलब्धि होती है- दुर्लभं त्रयमेवैतद्
देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।
अपने विवेकचूडामणि मे आचार्य शंङ्कर ने संसार मे तीन वस्तुओं की प्राप्ति मे देवकृपा को महत्वपूर्ण माना है-
सर्वप्रथम मानव शरीर, मोक्षेच्छा और सत्संग।
इसमें एक के बाद एक श्रेष्ठतर हैं।ऐदंप्राथम्येन मानव शरीर ही दुर्लभ है और उसकी प्राप्ति के अनन्तर संसार बन्ध से मुक्ति का भाव होना कठिन है।और उससे भी अधिक कठिन सत्संग की प्राप्ति है।
मानसकार ने अपनी भावाभिव्यक्ति इस सम्बन्ध मे इस प्रकार की है-
बिनु सत्संग विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
बिनु सत्संग भगति नहिं होई
ते तब मिलहिं द्रवै जब सोई
सत्संगति मुदमंगल मूला
सोइ फल सिधि सब साधन फूला
बढ़े भाग मानुष तन पावा
सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गावा
बड़े भाग पाइअ सतसंगा
बिनहिं प्रयास ह़ोइ भवभंगा।
इस प्रकार उक्त चौपाइयों के माध्यम से”सत्संगति संसृति
कर अंता “कहकर गोस्वामी जी ने मानव तन,मुक्ति कामना और सत्संग को तो मानो संसार बन्ध की मुक्ति का हेतु ही बता दिया है।इन सभी मे सबका मूल भगवत् कृपा को ही सिद्ध किया है क्योंकि उसके बिना तो कुछ भी सम्भव नहीं।
।।हरिश्शरणम्।।

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आत्मोपलब्धि के चार साधन

वेदान्त दर्शन की प्राथमिक पुस्तक “वेदान्तसार”मे सदानन्द योगीन्द्र ने वेदान्त के अधिकारी का निरूपण किया है-
“साधनचतुष्टयसंपन्नो
प्रमाता अधिकारी”
चार साधनों से युक्त व्यक्ति आत्मज्ञान का अधिकारी कहा गया है –
1-वैराग्य
2-विवेक
3-षट्कसंपत्ति
4-मुमुक्षता
वैराग्य-इस लोक से लेकर ब्रह्मलोक तक जो भी भोग्य है, उसमें “काक विष्ठावत् “घृणा
होना वैराग्य है।

विवेक-ब्रह्म का सत्यत्व और
परिणामी जगत् का मिथ्यात्व दृढ रूप से स्वीकार कर लेना, नित्यानित्य वस्तु विवेक है।

षट्कसंपत्ति-इसमें छ: सम्मिलित हैं –
क-शम-मन को संकल्प विकल्प से रोक कर हृदयाकाश मे स्थित आत्मदेव की ओर ले जाना।
ख-दम -इन्द्रियों को उनके विषयों शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से रोककर अपने-अपने गोलकों मे स्थिर करना।
ग-श्रद्धा-गुरु एवं शास्त्र के वाक्यों मे विश्वास करना।
घ-समाधान-हृदयाकाश मे ठहरे हुए मन द्वारा आत्मानुसन्धान।
ङ -उपरति-विषयों से हटे हुए मन को पुनः विषयों में जाने से रोकना।
च-तितिक्षा-बिना चिन्ता और विलाप के सुख दु:खादि सहन करना।

3- मुमुक्षता -संसार बन्ध से मुक्त होने की सतत इच्छा।
इस प्रकार उक्त साधनों पर अभ्यासी साधक आत्मोपलब्धि
का अधिकारी है ।

।।हरिश्शरणम्।।

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बन्धन-मुक्ति का कारण मन

चञ्चलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि
बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायु:
नावम् इव अम्भसि।
ब्रम्हाण्ड के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक
श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा कि गुरु देव ,मन तो बड़ा चञ्चल है इसका निग्रह और स्थिरीकरण कैसे हो ,यह तो सारी इन्द्रियों को मथ डालता है।यह बहुत सबल है और बड़ी दृढता से प्रत्येक इन्द्रिय के साथ मिल कर विषयों से संयोग करा देता है।
जैसै कोई नाव जो कि जल मे प्रवहमान है, जलधारा की ओर उसी दिशा मे बढ़ती चली जाती है उसी तरह यह मन भी विषय नदी मे बहता चला जाता है।
इस पर उत्तर आया कि,”मन्मना भव मद्भक्त:मद्याजी मां नमः
कुरु” अर्थात् मन को विषयों से मोड़कर मुझमें लगा देने पर ही यह स्थिर हो पायेगा।इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है।
शिक्षा देते हुए उन्होंने एक बात और कही- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।
यह सारे संसार को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा थी। मन ही है जो हमें किसी भी वस्तु, व्यक्ति, स्थान से बांध देता है और यही उनसे छुड़ा भी देता है।प्रत्येक जीव के संसार बन्धन और मुक्ति का यही एकमेव कारण है।
कोई किससे बंधना चाहता है या किससे छूटना चाहता है उन सबका कारण मन ही है।अतः इसे मुझे दे देने या मुझमें लगाने पर ही लोकालोक का मार्ग सुगम होगा, नहीं तो किं कर्तव्य विमूढ बने रहोगे।
इस प्रकार की श्रेष्ठ शिक्षा
प्रत्येक मनुष्य के लिए है।
सारे जप ,तप धर्म, यम,नियम, शास्त्र, व्रतानुष्ठान का लक्ष्य मन का निग्रह करना ही है।शुकवाणी भी इसी ओर संकेत करती प्रतीत होती है-
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च
श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता
परं हि योगो मनस:समाधि:।।

।।हरिश्शरणम्।।

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गुरु से अभिन्न ज्ञान वैराग्य

सारे वेदादि हमें ब्रह्म को दिखला नहीं सकते, इतना अवश्य है कि जिस आवरण ने हमारे नेत्र के सामने से सत्य को छिपा रखा है, उसे हटाने मे वे सहायता पहुंचा सकते हैं।
इस तरह पहले अज्ञानावरण हटता है, तब जाता है पाप ,और उसके बाद वासना एवं स्वार्थपरता दूर होती जाती है।अत एव सभी दु:खों-कष्टों का अवसान हो जाता है।
इस अज्ञान का तिरोभाव तभी होता है, जब हम यह जान लें कि ब्रह्म और मैं एक ही हूं, अर्थात् स्वयं को आत्मा के साथ अभिन्न कर लें, मानवीय उपाधियों के साथ नहीं।
देहात्मबुद्धि दूर होते ही सारे दु:ख-क्लेश दूर हो जायेंगे।
मनोबल से समस्त रोगों को दूर कर देने का यही रहस्य है।
यह संसार सम्मोहन(Hypnotism)का एक
कार्य है।जब हम अपने ऊपर से सम्मोहन के इस प्रभाव को दूर करते हैं, तब कष्ट नहीं रहता।
मुक्त होने के क्रम मे पहले पाप त्याग कर पुण्योपार्जन और उसके बाद दोनों का परित्याग।
पहले रजोगुण के द्वारा तमोगुण पर विजय करना होगा।बाद मे दोनों को ही सत्वगुण मे विलीन करना होगा।अन्त मे इन तीनों गुणों के परे जाना होगा।
इस प्रकार की एक अवस्था प्राप्त करनी होगी, जिसमें प्रत्येक श्वास-प्रश्वास उसकी ही उपासना स्मरण चिन्तन मे व्यतीत होगी।
जब यह अनुभूति हो कि दूसरों की बातों से हमें कुछ शिक्षा मिली, तब समझना पड़ेगा कि पूर्व जन्म में हमें उस विषय की अभिज्ञता(पहचान)प्राप्त हुई थी,क्योंकि अभिज्ञता ही हमारी
एकमात्र शिक्षक है।
जिसको जितनी क्षमता प्राप्त होती जायेगी, कष्ट बढ़ता जायेगा।अतः वासना का समूल नाश करना होगा।वासना करना मानों बर्रे के छत्ते को लकड़ी से कोंचने के समान है।और अनेकानेक वासनाएँ तो मानों सोने के पत्तों से आवृत विष की गोलियों के समान हैं…….
इसे ही जानने का नाम वैराग्य/ज्ञान है।

।।हरिश्शरणम्।।

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