चतुर्दश अध्याय में ही भगवान् ने तीनों गुणों को बन्धनकारक बताने के बाद, इन सभी का क्रमशः लक्षण कहा है-
सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्
प्रकाश उपजायते
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्
विवृद्धं सत्वम् इति उत।।
अर्थात्- जिस समय इस शरीर में तथा इसके सभी द्वारों में, अन्त:करण और इन्द्रियों में चेतनता एवं विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्वगुण बढ़ा है, यानी सर्वाधिक है।
लोभ:प्रवृति:आरम्भ:
कर्मणाम् अशम: स्पृहा।
रजसि एतानि जायन्ते
विवृद्धे भरतर्षभ।।
अर्थात्-हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर, यानी अन्यों से अधिक हो जाने पर-लालच ,सांसारिक चेष्टा, सभी कार्यों को स्वार्थ बुद्धि या सकाम भाव से करने लगना, अशान्ति(मन की चंचलता)और विषय भोगों की लालसा आदि उत्पन्न होते हैं।
अप्रकाश: अप्रवृत्ति: च
प्रमादो मोह एव च
तमसि एतानि जायन्ते
विवृद्धे कुरुनन्दन।।
अर्थात्- हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर ,यानी तीनों गुणों में सर्वाधिक हो जाने पर, अन्त:करण तथा इन्द्रियों में अन्धकार(अज्ञान),कर्तव्य कर्मों में रूचि का अभाव और व्यर्थ चेष्टा तथा निद्रादि अन्त:करणकी मोहिनी वृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
इतना कहने के बाद भगवान् ने कहा कि सत्वगुण वृद्धि से दिव्य स्वर्गादि लोक,रजोगुण वृद्धि से पुनः मनुष्य लोक तथा तमोगुण की वृद्धि से कीट पतंगादि योनियों की प्राप्ति, शरीर छोड़ने पर, होती है, ऐसा जानना चाहिए –
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था
मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।
जघन्यगुणवृत्तिस्था
अधो गच्छन्ति तामसा:।।
इस प्रकार यदि मनुष्य को इन गुणों के पार जाना है, तो सारी कामनाओं को त्याग कर, कर्तापने के अभिमान से दूर होना पड़ेगा –
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीत: स उच्यते।।
सारे संकल्पों को त्यागकर एक मात्र भगवत् शरणागति-
“सर्वधर्मान्परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज”
ही उपाय है।
।।हरिश्शरणम् ।।