सत्वगुण और रजोगुण तो बन्धन कारक है ही, तमोगुण इन सभी से अधिक बन्धन का कारण होता है। वृहदारण्यक उपनिषद् में इसीलिये ऋषि ने तम(अन्धकार) से निवृत्ति और प्रकाश की प्राप्ति की बात कही है -असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय
उक्त मन्त्र में परमात्मा से, असत्य से सत्य, तम से ज्योति एवं मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलने की प्रार्थना की गई है।और वस्तुतः मृत्यु से अमरत्व और कुछ नहीं ,वरन् विषयों से विनिवृत्त होकर ,जीवन्मुक्त हो जाना है।नहीं तो अनेक जन्मों के समूहालम्बीकृत गुण बन्ध के पाशविक पाश से पार पाना असम्भव है।
सर्वशास्त्र-मयी “गीता” के चतुर्दश अध्याय मे ही तमोगुण से जीवात्मा के बन्धन का स्वरुप बताया गया है।यह तमोगुण प्रमाद -आलस्य और निद्रादि के द्वारा जीवात्मा के मुक्ति-मार्ग में बाधक बनता है।और जन्म-मृत्यु रूप संसार में ही फंसाये रहता है, यही उसका”जीवात्मा को बांधना” है।
जिस प्रकार रजोगुण को कामना आसक्ति से उत्पन्न बताया था, उसी तरह अज्ञान और तमोगुण भी है।इसके मध्य भी बीजवृक्षवत् सम्बन्ध है।तात्पर्य ये है कि, अज्ञान से तमोगुण बढ़ता है और तमोगुण से अज्ञान।देह को आत्मा से पृथक् करके दृष्टि रखने में ही सारी समस्याओं का समाधान है, नहीं तो यह तमोगुण सभी देहाभिमानियों को अज्ञान से आवृत(विवेकरहित) करके प्रमादालस्य निद्रा(भ्रम , अनवधानता सुस्ती, नींद आदि)से जकड़ कर रखता है।और जिससे जीवात्मा इस जन्म में तो कष्ट पाता ही है, उसकाअन्य जन्म भी मूढ योनियों(कीट-पतंग,पशु-पक्षी, वृक्ष-लता प्रभृति)में होता है।
तम: च अज्ञानजं विद्धि
मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि:
तन् निबध्नाति भारत।।
रजसि प्रलयं गत्वा
कर्मसंगिषु जायते।
तथा प्रलीन: तमसि
मूढयोनिषु जायते।।
इस प्रकार रजोगुण बढ़े होने की दशा में मृत्यु प्राप्त करके मनुष्य योनि में जन्म के बाद, तमोगुण के बढ़ने पर तिर्यगादि निम्न योनियों में उत्पन्न होता है।
भगवान् सहायक हों और हमें सद्बुद्धि दें, जिससे हम इन गुणों के बन्धन से मुक्त हो सकें।
।। हरिश्शरणम् ।।