गीता के चतुर्दश अध्याय में सत्वगुण को जिस तरह बन्धन बताया गया है, उसी तरह रजोगुण को भी संसार बन्धन कारक कहा गया।यदि साधक सत्व गुणाधीन है, तो उसे केवल ज्ञानाहंकार से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।धीरे धीरे वह उसके पार जा सकता है।
अब रजोगुण को देखें, तो यह बात स्पष्ट होती है कि यह तो कामना परक है ही।वस्तुतः इस रजोगुण की वृद्धि से ही काम और आसक्ति का उद्भव होता है। एक तरह से कहें ,तो इसमें कामनाओं की शृंखला बन जाती है।एक की पूर्ति होते ही, दूसरी-तीसरी और अनेकानेक कामनाओं से आवृत हो जाता है, साधक।नि:सन्देह इसे
बीज-वृक्ष न्याय कहें तो अधिक सटीक बात होगी।
जैसै, वृक्ष बीज से उत्पन्न होता है और पुनः उसी वृक्ष से अधिसंख्य नवीन बीज उत्पन्न हो जाते हैं।कालान्तर में अन्य नूतन वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं, और इस प्रकार, यह क्रम निरन्तर चलता रहता है।कभी बीज कारण है, तो वृक्ष कार्य और कभी वृक्ष कारण है, तो बीज कार्य।यह अन्योन्य आश्रय से बीजवृक्षवत् ,रजोगुण एवं कामनासक्तिवत् चलता ही रहता है।अतः भगवान् ने कहा-
रजो रागात्मकं विद्धि
तृष्णासंगसमुद्भवम् ।
तन् निबध्नाति कौन्तेय
कर्म-संगेन देहिनम् ।।
अर्थात्- हे अर्जुन!अनुराग रूप रजोगुण को तू काम और आसक्ति से उत्पन्न जानो
(काम एष: क्रोध एष:रजोगुण समुद्भव:)यह रजोगुण जीव को कर्मों और उसके फलों के सम्बन्ध से दृढतापूर्वक बांध देता है।
सांसारिक विषयासक्ति को निरन्तर दृढतर करनेवाला होने से ही”तृष्णासंगसमुद्भवम्”कहा गया है।इसी तरह”कर्मसंग”का अभिप्राय है कि इन कर्मों और फलों की चक्की में पिसता हुआ, मनुष्य इनका कर्ता-भोक्ता, स्वयं को मानने की निर्बाध दृढ परम्परा में फंसा रहता है।यही कर्मसंग से जीव का जन्म-मृत्यु बन्धन है।
इससे मुक्ति का एकमात्र उपाय भगवत् शरणागति ही है।
।।हरिश्शरणम् ।।