सत्वगुण भी बन्धन

गीताशास्त्र में भगवान् ने प्रकृति के तीनों गुणों की चर्चा की है।उन्होंने स्वयं को बीज स्थापन करनेवाला पिता तथा, प्रकृति को माता(योनि)कहा है-
सर्वयोनिषु कौन्तेय
मूर्तय:सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं
बीजप्रद: पिता। ।। (गीता अध्याय 14, श्लोक 4)
तदनन्तर उन्होंने तीनों गुणों, सत्,रज और तम को शरीर धारी के शरीर को बांधने वाला कहा है-
सत्वं रजस्तम इति
गुणा:प्रकृतिसम्भवा:।
निबध्नन्ति महाबाहो
देहे देहिनमव्ययम्।।(गीता अध्याय 14, श्लोक 5)

इनमें सत्वगुण यद्यपि निर्मल(शुद्ध स्वच्छ)होने से प्रकाशक है ।अनामय (नीरोगता) प्रदान करने वाला भी है।किन्तु सुख सम्बन्ध से बंधन कारक भी है। साथ ही साथ “मैं ज्ञानी हूँ “ऐसा अभिमान उत्पन्न करके ज्ञान सम्बन्ध के कारण बांधता है।और गुणातीत अवस्था के मार्ग पर जाने नहीं देता –
तत्र सत्वं निर्मलत्वात्
प्रकाशकम् अनामयम् ।
सुखसंगेन बध्नाति
ज्ञानसंगेन चानघ ।।(गीता अध्याय 14, श्लोक 6)

।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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