नशा से नाश

“बद्धो हि को यो विषयानुरागी ”
आचार्य भगवत् पाद शङ्कर ने
विषयवासनाओं में फंसे हुए लोगों को बद्ध कहा है। वासनाएं मनुष्य को आकृष्ट कर, बारम्बार के जन्म-मृत्यु पाश में जकड़े रहती हैं, उससे बाहर निकलने नहीं देती।इन्हीं वासनाओं के भ्रम जाल की सुन्दर, आकर्षक, लेकिन शरीर क्षय करने वाली एक विशेष वस्तु है, नशा।यह केवल और केवल मनुष्य के शरीर, स्वास्थ्य को उत्तरोत्तर खराब ही करती है।हालांकि औषधि रूप में सेवन हो तो कोई बात नहीं किन्तु अनावश्यक यदि सेवन हो रहा है, तो वर्तमान ही भविष्यत् जन्म के लिये भी कष्टाय ही होगी।
एक स्वामी जी ने पद्मपुराण का एक श्लोक उद्धृत करते हुए, नशीली वस्तुओं से दूर रहने का निर्देश दिया था-
विजया कल्पमेकं च दश कल्पं च नागिनी।
मदिरा कल्पसहस्राणि धूमसंख्या न विद्यते ।।
अर्थात्- भांग खाने वाला एक कल्प ,संखिया खाने वाला दश कल्प,शराब पीने वाला हजारों कल्प तथा धूम्रपान करनेवाला कितने कल्पों तक नरक गामी होगा, इसकी संख्या नहीं है।
यदि हमें अपने शरीर को रोग मुक्त रखना है, तो इनके सेवन से बचना होगा, भगवान् सद्बुद्धि दें, और हमारी सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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