गीताशास्त्र में भगवान् ने चार प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया है।चतुर्थ अध्याय का नामकरण ज्ञान-कर्म-सन्यास किया गया है, जिसमें आत्मसंयम रूपी यज्ञ को बताते हुए इसके अन्तर्गत चार यज्ञ वर्णित हैं-
द्रव्य-यज्ञास्तपो यज्ञा:
योगयज्ञा:तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञा: च
यतयः संशितव्रताः।।
अर्थात्-कितने लोग द्रव्य सबन्धी यज्ञ करनेवाले होते हैं।और कितने ही तपस्या रुपीयज्ञ करनेवाले हैं।इसी प्रकार कितने लोग योगरूप यज्ञ करनेवाले और कितने कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त संयमी जन स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करनेवाले होते हैं।
द्रव्ययज्ञ – न्याय से द्रव्य को अहंकार, आसक्ति और स्वार्थ त्याग करके यथायोग्य लोकसेवा में लगाना द्रव्य यज्ञ है।जैसे कि-बुभुक्षित को भोजनादि,अनाथ,रोगी, दुखी, असमर्थ को यथायोग्य अन्न,वस्त्र, जल,औषधि, पुस्तकादि द्वारा सेवा तथा विद्वान्, सदाचारी महात्माओं की गौ,भूमि,ग्रन्थ, वस्त्र आदि से यथाशक्ति सहायता करना।इसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी बिना किसी फल की इच्छा किए सुख पहुंचाने के उद्देश्य से सामर्थ्य के अनुसार द्रव्य व्यय करना “द्रव्ययज्ञ” है।
तपोयज्ञ-परमात्मा की प्रति के उद्देश्य से अन्तरिन्द्रियों को पवित्र करने के लिए निष्काम निर्लिप्त भाव से व्रतोपवास,स्वधर्म पालन हेतु कष्ट सहना।मौन व्रत धारण करना।एक या दो वस्त्रों से ही जीवन व्यतीत करना।शरीर निर्वाह हेतु सात्विक भोजन और शास्त्र निर्देशानुसार तितिक्षा सम्बन्धी क्रियाओं का पालन करना, ये सभी तपोयज्ञ हैं।
योगयज्ञ-इस पद का अभिप्राय चित्तवृत्ति निरोधरूप आठों प्रकार के योगों के अनुष्ठान से है।ये आठ योग इस प्रकार हैं-यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
स्वाध्याय ज्ञान यज्ञ-जिन शास्त्रों में भगवान् के तत्व का तथा उनके साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण स्वरूप का वर्णन है -ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना।भगवन्नाम जप स्तुति और उनकी लीला-गुणोंका कीर्तन करना।वेद वेदांग का नियम पूर्वक अध्ययन करना स्वाध्याय है।ऐसा स्वाध्याय अर्थ ज्ञान के सहित होने से तथा ममता, आसक्ति और फलेच्छा के अभाव पूर्वक किए जाने से ‘स्वाध्याय यज्ञ” है।
इस प्रकार के यज्ञ कार्य में लगा हुआ साधक निश्चय ही जीवन्मुक्त है।
।।हरिश्शरणम्।।
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