गीता के षष्ठ अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को योगी बनने का निर्देश दिया।योगी की महत्ता समझाते हुए कहते हैं-
तपस्विभ्योधिको योगी
ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी
तस्माद् योगी भवार्जुन।।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है।वह शास्त्र ज्ञाताओं से भी बड़ा माना गया है।और सकाम कर्म करने वाले लोगों से भी योगी बढ़कर है।इसलिए हे अर्जुन!
तू योगी बन।
योगी से तात्पर्य ऐसे पुरूष से है, जो कर्म, भक्ति और ज्ञान आदि सभी साधनों की पराकाष्ठा रूप समत्व योग प्राप्त हुआ हो।इसी तरह तपस्वी का मतलब विषयभोगों को त्याग कर मन,इन्द्रिय और शरीर सम्बन्धी सभी कष्टों को सहने वाला साधक।
यहां वस्तुतः ज्ञानी से तात्पर्य शास्त्रझ और कर्मी से तात्पर्य शास्त्र विहित यज्ञ, दानादि शुभ कर्मी,स्वर्गादि सकामी से है।
यह भी ध्यातव्य है कि कर्मी में तपस्वी तथा ज्ञानी का अन्तर्भाव नहीं है।क्योंकि इन तीनों की अपनी अपनी विलक्षणता है।यथा-कर्मी में
क्रिया की प्रधानता है, तपस्वी
में मन और इन्द्रियों के संयम की तथा ज्ञानी में शास्त्रीय बौद्धिक आलोचना की।
इस क्रम में आगे सभी योगियों में श्रद्धालु योगी को सर्वोत्तम की संज्ञा दी गई है-श्रद्धावान् भजते
यो मां स मे युक्ततमो मत:।
।।हरिश्शरणम्।।