त्रिगुणातीत

गीता के चतुर्दश अध्याय मे भगवान् ने चार श्लोकों मे प्रकृति के तीनों गुणों का तात्विक विवेचन किया।इसमें सारतः उन्होंने, स्पष्ट रूप से, आप्तकाम, मुक्तकाम,जीवन्मुक्त अथवा गुणातीत ब्राह्मी स्थिति को परिभाषित किया-
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च
मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि
न निवृत्तानि कांक्षति।।
उदासीनवदासीनो
गुणै:यो न विचाल्यते।
गुणा:वर्तन्त इत्येव
योवतिष्ठति नेंगते।।
समदु:खसुख: स्वस्थ:
समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:।।
मानापमानयोः तुल्य:
तुल्यो मित्रारिपक्षयो:
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीत:स उच्यते।।

भगवान् बोले-हे अर्जुन!(जो मनुष्य) (सत्वगुण के कार्य रुप)
प्रकाश (ज्ञान)को और (रजोगुण की कार्य रुप) प्रवृत्ति(अर्थात् कर्म करने की स्फुरणा) को
तथा (तमोगुण की कार्यरुप)
मोह-भ्रान्ति को भी न तो प्रवृत्त होने पर(यानी उनके प्राप्त होने पर)बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर(अर्थात् उनका अभाव हो जाने पर)(उनकी)कामना करता है।जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ, गुणों के द्वारा चलायमान नहीं होता(और) “गुण ही गुणों में बरतते हैं” ऐसा(समझता हुआ)जो(परमात्मा में एकीभाव से)स्थित रहता है(एवम्)(उस स्थिति से कभी)कम्पित विचलित नहीं होता है।जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दु:खसुख को समान समझने वाला, मिट्टी-पत्थर-
सोने में समान भाव वाला, प्रिय-अप्रिय को एक जैसा मानने वाला, धैर्यवान् तथा अपनी बुराई-बड़ाई में एक सा रहने वाला है, और जो मान-
अपमान में एक सा है।मित्र-शत्रु
पक्षों के प्रति समान है तथा सभी क्रियाओं में कर्तापने के
अभिमान से रहित है -(मनुष्य)
“गुणातीत” (गुणों से परे या
उनसे अप्रभावित कहा जाता है।
यही गुणातीत ब्राह्मी स्थिति है।

।। हरिश्शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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