प्रणव (ओम्)

प्र-प्रकृष्ट रूप से या आत्यन्तिक अन्तिम रुप से,
नव -नवीनतम ,जो है, उसे प्रणव कहते हैं। इसे ही ओम् भी,कहकर सर्वादि सिद्ध किया गया है। यह ओम् या प्रणव पवित्र घोष का अभिव्यंजक है।”शब्दो वै ब्रह्म “की अवधारणा मे यह ब्रह्म है।सृष्टि का आद्यक्षर भी।
वर्णों की दृष्टि से इसमें तीन अक्षरों का समावेश है-अ ,उ तथा म ।इन्हीं का सन्धिगत समष्टिगत रुप ओम् है ।निर्गुण निराकार ब्रह्म का प्रतीक होने के साथ साथ यह सगुण ब्रह्म का भी बोधक है।
अकार विष्णु का प्रतिनिधि(अक्षराणामकारोस्मि)
उकार शिव उन्नति परमोन्नति का प्रतिनिधि और मकार ब्रह्मा का बोधक है ,जिसके द्वारा काल गणना होती है। इस तरह त्रिदेवों के तीनों कार्यों-सृजन, पालन और संहार को भी ओम् सूचित करता है।
इस तरह यह नाम रूपात्मक विश्व का बोधक बन जाता है।संसार के सभी पदार्थों की अभिव्यक्ति वर्णों/अक्षरों से होती है।संस्कृत.ही नहीं सभी भाषाओं के सभी वर्णों और ध्वनियों का उच्चारण स्थान या तो मुख का सबसे भीतरी भाग-कण्ठ – है अथवा सबसे बाहरी भाग ओष्ठ, नासिका।
इसतरह विचार करने पर “अ”का उच्चारण स्थान कण्ठतथा “उ”का ओष्ठ माना गया है। “म” भी ओष्ठ और नासिका से उच्चरित होता है।इस प्रकार समूहालम्बनात्मक दृष्टि से ओम् मे बाहरी/भीतरी दोनों ध्वनियों का समावेश है।
दूसरे शब्दों में ओम् मे सभी के समाहित होने से, उसी मे सभी सांसारिक अभिव्यक्त विषयों, पदार्थों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की समष्टि दृष्टिगत होती है।
वस्तुतः “ओम्’ और ब्रह्म (सगुण, निर्गुण)एक ही हैं।
।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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