विश्व के सामने गीता ने बड़ा क्रान्तिकारी विचार रखा है।वह विचार है, “गृहस्थ-सन्यास” ।जहाँ अन्य विचारधाराओं ,मतमतान्तरों ने सन्यासी के लिए घर बार छोडकर वन-पर्वतादि निर्जन स्थानों में चले जाना, उचित माना है, वहीं गीता ने जगत् के धार्मिक-दार्शनिक इतिहास में प्रथम बार,यह चरमोद्घोष किया है कि यह सब नितान्त आवश्यक नहीं है।
साधक का इन्द्रियों को वश में कर ,मन को बुद्धि के अंकुश तले लाकर और पुनः स्थिरधी बनकर अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को पूर्ण ब्रह्म प्राप्ति हेतु केन्द्रित कर देना ही, “सन्यास ” है।यह तो चित्तस्थ एक आन्तर प्रक्रिया है, जिसके साथ जिज्ञासु के देश, वेश,प्रदेश, परिवेश का दूरत: सम्बन्ध नहीं है।
पग पग पर गीता अपने भक्त को स्मरण कराती है कि भय से भागना भीरुता है और प्रबल प्रतिरोध करना, वीरता ।एक सच्चा सन्यासी वह है, जो गृहस्थ कर्मों का पालन करता हुआ कुटिल, कुमति, कृतघ्न कुटुम्बियों के क्रूर कर्म-चक्रवात में भी हिमाचलवत् अचल खड़ा रहे।
कामन-कामिनी-कांचन के करालानल में फंसा हुआ भी ,प्रह्लाद सदृश स्वयं को आंच न लगने दे।
मद-मोह-मात्सर्य के महामकरों से समावृत होकर भी स्वयं ध्रुव धैर्य धारण किए रहे।
विषय-वासना-विलास की वारिधि में वास होने पर भी कमलवत् अप्रभावित रहे।इस प्रकार वानप्रस्थी ही नहीं, गृहस्थी भी असाधारण रूप से, ” सन्यासी ” बनने का अधिकारी है।
समाज के किसी भी क्षेत्र में अपने सांसारिक कर्तव्य का निर्वाह करता हुआ कोई भी व्यक्ति-धनी-निर्धन,स्त्री-पुरूष, ब्राह्मण-शूद्र, बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित सन्यास ग्रहण कर सकता है।नि:सन्देह, गीता का ” गृहस्थ-सन्यास ” सभी के लिये अनुपम वरदान स्वरूप है ।
।।हरिश्शरणम्।।