मानव कल्याण की दृष्टि से श्रीमद्भगवद्गीता मे योग को “पूर्णयोग” बनाकर समन्वित स्वरूप मे प्रतिष्ठित किया गया है।वैदिक साहित्य की तरह इसमें भी मुक्ति(मोक्ष)के त्रिविध मार्गों -कर्म, भक्ति और ज्ञान का अनुमोदन किया गया है।किन्तु
पूर्ववर्तियों ने जहाँ तीनों को पृथक्-पृथक् मार्ग मानकर इनमें से किसी एक को भी स्वतन्त्र रूप से लक्ष्य सिद्धि का क्षम साधन मानते हैं, वहां “गीता” किसी एक मार्ग को अलग न मानकर तीनों को एक मार्ग (महामार्ग) के अभिन्न अंग के रूप में देखती है, और यही”पूर्णयोग”है।
कहना न होगा कि एक मार्ग का आश्रयण साधक को अपने निश्चित निर्धारित लक्ष्य से विच्युत कर देगा।समन्वित और पूर्णयोग की यह अवधारणा शुद्ध रूप से जीवन तथ्य पर अवलम्बित है।इस समग्रता के तीन स्तम्भ हैं, जो मानव जीवन की लीला कथा के तीन तत्व हैं-
1-इन्द्रिय (कर्मजनक )
2- मन (भक्तिजनक)
3-बुद्धि (ज्ञानजनक )
वस्तुतः इन तीनों के समुचित और सामूहिक विकास से ही व्यक्तित्व का सम्पूर्ण व सर्वांगीण उत्कर्ष सम्भव है, जिससे कोई व्यक्ति बन सकता है, नहीं तो व्यक्तित्व के बिना कोई व्यक्ति कैसे है,मनुष्यत्व के विना कोई मनुष्य कैसे? इनमेंसे किसी एक की अवहेलना से उसका व्यक्तत्व अधूरा रह जायेगा।
अतः इस इन्द्रिय, मन और बुद्धि की त्रिवेणी के संगम मे पवित्र भावपूर्ण सद्गुरू कृपाधारित “स्नान”मनुष्य को मनुष्य बनाएगा, यही”पूर्णयोग” की त्रिवेणी है।यही ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद् का अनुपम सन्देश है।
।।हरिश्शरणम्।।