वेदों का अंकुरित” ज्ञान” ब्राह्मण ग्रन्थों मे पल्लवित, आरण्यकों मे प्रफुल्लित और उपनिषदों मे
प्रबलित हुआ।किन्तु अनेकानेक ऋषियों, आचार्यों, दार्शनिकों एवं धर्मगुरुओं के बहुसंख्य परस्पर विरोधी मतों से आक्रान्त होकर यह विषय सामान्य जिज्ञासु के लिए”चक्रव्यूह”बन गया।ऐसी स्थिति मे, उन सभी पन्थों का
उपसंहार करनेवाली “गीता”
मानव कल्याण का मेरूदण्ड बनी।श्री मधुसूदन सरस्वती जी ने इस प्रक्रिया का बहुत सुन्दर चित्र खींचा,जिसमें सारी उपनिषदें गाय बनी हैं।दूहने वाले “गोपाल” “श्रीकृष्ण” हैं।पृथापुत्र (अर्जुन) बछड़े के रूप मे हैं, तथा गीतामृत ही दुग्ध है।इस प्रकार के मंथन से नव्य मार्ग ने जन्म लिया- सर्वोपनिषदो गावो ,दोग्धा गोपालनन्दन:।पार्थो वत्स:सुधी:भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्।।
नया पथ प्रशस्त करनेवाली
“गीता”ने एक नवीन शब्द दिया
“निष्काम”।इसमे परम्परागत यज्ञ अनुष्ठान आदि सकाम कर्मों से फलित स्वर्गादि अनित्य सुखों की अपेक्षा नित्य (मुक्ति प्रद)कर्मों का समुद्घोष हुआ।जिसके लिए”निष्काम कर्म”शब्द प्रयुक्त किया गया।
तार्किक दृष्टि से कोई कर्म यदि फलाकांक्ष होकर न करें, तो वह कोई फल या वासना उत्पन्न नहीं कर सकता।क्योंकि जैसा कारण वैसा कार्य।
मतलब जब वासनाएं पैदा होना बन्द हो जायेंगी ,तो उन्हें तृप्त करने के लिए नये जन्म का प्रश्न ही नहीं उठता।और नये जन्म न लेने का तात्पर्य मुक्ति ही है।इस प्रकार जन्म जन्मान्तर के विषयेन्द्रिय जन्य वासनाओं के अनवरत, प्रबल झंझावात से बचकर शान्तिप्राप्ति हेतु “निष्काम कर्म” एक अमोघ दिव्यास्त्र है।
।।हरिश्शरणम्।।