एक जगह बाबा तुलसीदास ने बड़े साफ शब्दों में कह डाला है- बारि मथे घृत होय बरु ,
सिकता ते बरु तेल
बिनु हरिभजन न भव तरिअ
यह सिद्धांत अपेल।।
मतलब जल को मथने पर घी की प्राप्ति हो सकती है, और बालू को पेरने पर तेल भी
निकल सकता है, किन्तु बिना भगवान का भजन (स्व मे तत् स्वरूपानुसन्धान)किए और किसी भी तरह भवसागर से पार होना असंभव है ।
फिर एक जगह वे कहते हैं-
अब प्रभु कृपा करहुँ एहि भांती
सब तजि भजन करहुँ दिनराती
हे नाथ आप केवल और केवल इतनी कृपा करें कि मैं सब कुछ त्याग कर आपको भजता रहूं अर्थात् आपका विस्मरण क्षणमात्र के लिए भी नहीं हो।
पुनः एक प्रसंग मे बालि से कहवाते हैं-अचल करौं तन राखहुं प्राना ।बालि कहा सुनु
कृपा निधाना।जनम जनम
मुनि जतन कराहीं।अन्त राम
कहि आवत नाहीं।।
तात्पर्य यह है कि भगवान की कृपादृष्टि किसी भी यत्न प्रयत्न के अधीन नहीं है।अन्त काल में भी ,सारे जन्म मे अनेकानेक जन्म मे भी उनकी कृपा यत्नों के अधीन नहीं, वह तो क्षणमात्र मे प्राप्त है,जीव की अन्त:पुकार पर बिना यत्न सुलभ है।
फर्क यही है कि मनसा, वाचा ,कर्मणा निश्छल भाव से सारी चतुराई भूलकर शरणागत होना होगा-
मन क्रम वचन छाड़ि चतुराई
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।