सत् संग से जीवन्मुक्ति

साधना की दृष्टि से भगवत् कृपा के द्वारा मुक्ति की इच्छा और तदर्थ प्रयत्न तथा सत्संग की प्राप्ति ये तीन दुर्लभ वस्तुएँ हैं।इनसे विवेक प्राप्ति होकर जीवन्मुक्ति की उपलब्धि होती है- दुर्लभं त्रयमेवैतद्
देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं
महापुरुषसंश्रय:।।
अपने विवेकचूडामणि मे आचार्य शंङ्कर ने संसार मे तीन वस्तुओं की प्राप्ति मे देवकृपा को महत्वपूर्ण माना है-
सर्वप्रथम मानव शरीर, मोक्षेच्छा और सत्संग।
इसमें एक के बाद एक श्रेष्ठतर हैं।ऐदंप्राथम्येन मानव शरीर ही दुर्लभ है और उसकी प्राप्ति के अनन्तर संसार बन्ध से मुक्ति का भाव होना कठिन है।और उससे भी अधिक कठिन सत्संग की प्राप्ति है।
मानसकार ने अपनी भावाभिव्यक्ति इस सम्बन्ध मे इस प्रकार की है-
बिनु सत्संग विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
बिनु सत्संग भगति नहिं होई
ते तब मिलहिं द्रवै जब सोई
सत्संगति मुदमंगल मूला
सोइ फल सिधि सब साधन फूला
बढ़े भाग मानुष तन पावा
सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गावा
बड़े भाग पाइअ सतसंगा
बिनहिं प्रयास ह़ोइ भवभंगा।
इस प्रकार उक्त चौपाइयों के माध्यम से”सत्संगति संसृति
कर अंता “कहकर गोस्वामी जी ने मानव तन,मुक्ति कामना और सत्संग को तो मानो संसार बन्ध की मुक्ति का हेतु ही बता दिया है।इन सभी मे सबका मूल भगवत् कृपा को ही सिद्ध किया है क्योंकि उसके बिना तो कुछ भी सम्भव नहीं।
।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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