चञ्चलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि
बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायु:
नावम् इव अम्भसि।
ब्रम्हाण्ड के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक
श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा कि गुरु देव ,मन तो बड़ा चञ्चल है इसका निग्रह और स्थिरीकरण कैसे हो ,यह तो सारी इन्द्रियों को मथ डालता है।यह बहुत सबल है और बड़ी दृढता से प्रत्येक इन्द्रिय के साथ मिल कर विषयों से संयोग करा देता है।
जैसै कोई नाव जो कि जल मे प्रवहमान है, जलधारा की ओर उसी दिशा मे बढ़ती चली जाती है उसी तरह यह मन भी विषय नदी मे बहता चला जाता है।
इस पर उत्तर आया कि,”मन्मना भव मद्भक्त:मद्याजी मां नमः
कुरु” अर्थात् मन को विषयों से मोड़कर मुझमें लगा देने पर ही यह स्थिर हो पायेगा।इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है।
शिक्षा देते हुए उन्होंने एक बात और कही- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।
यह सारे संसार को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा थी। मन ही है जो हमें किसी भी वस्तु, व्यक्ति, स्थान से बांध देता है और यही उनसे छुड़ा भी देता है।प्रत्येक जीव के संसार बन्धन और मुक्ति का यही एकमेव कारण है।
कोई किससे बंधना चाहता है या किससे छूटना चाहता है उन सबका कारण मन ही है।अतः इसे मुझे दे देने या मुझमें लगाने पर ही लोकालोक का मार्ग सुगम होगा, नहीं तो किं कर्तव्य विमूढ बने रहोगे।
इस प्रकार की श्रेष्ठ शिक्षा
प्रत्येक मनुष्य के लिए है।
सारे जप ,तप धर्म, यम,नियम, शास्त्र, व्रतानुष्ठान का लक्ष्य मन का निग्रह करना ही है।शुकवाणी भी इसी ओर संकेत करती प्रतीत होती है-
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च
श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता
परं हि योगो मनस:समाधि:।।
।।हरिश्शरणम्।।