सारे वेदादि हमें ब्रह्म को दिखला नहीं सकते, इतना अवश्य है कि जिस आवरण ने हमारे नेत्र के सामने से सत्य को छिपा रखा है, उसे हटाने मे वे सहायता पहुंचा सकते हैं।
इस तरह पहले अज्ञानावरण हटता है, तब जाता है पाप ,और उसके बाद वासना एवं स्वार्थपरता दूर होती जाती है।अत एव सभी दु:खों-कष्टों का अवसान हो जाता है।
इस अज्ञान का तिरोभाव तभी होता है, जब हम यह जान लें कि ब्रह्म और मैं एक ही हूं, अर्थात् स्वयं को आत्मा के साथ अभिन्न कर लें, मानवीय उपाधियों के साथ नहीं।
देहात्मबुद्धि दूर होते ही सारे दु:ख-क्लेश दूर हो जायेंगे।
मनोबल से समस्त रोगों को दूर कर देने का यही रहस्य है।
यह संसार सम्मोहन(Hypnotism)का एक
कार्य है।जब हम अपने ऊपर से सम्मोहन के इस प्रभाव को दूर करते हैं, तब कष्ट नहीं रहता।
मुक्त होने के क्रम मे पहले पाप त्याग कर पुण्योपार्जन और उसके बाद दोनों का परित्याग।
पहले रजोगुण के द्वारा तमोगुण पर विजय करना होगा।बाद मे दोनों को ही सत्वगुण मे विलीन करना होगा।अन्त मे इन तीनों गुणों के परे जाना होगा।
इस प्रकार की एक अवस्था प्राप्त करनी होगी, जिसमें प्रत्येक श्वास-प्रश्वास उसकी ही उपासना स्मरण चिन्तन मे व्यतीत होगी।
जब यह अनुभूति हो कि दूसरों की बातों से हमें कुछ शिक्षा मिली, तब समझना पड़ेगा कि पूर्व जन्म में हमें उस विषय की अभिज्ञता(पहचान)प्राप्त हुई थी,क्योंकि अभिज्ञता ही हमारी
एकमात्र शिक्षक है।
जिसको जितनी क्षमता प्राप्त होती जायेगी, कष्ट बढ़ता जायेगा।अतः वासना का समूल नाश करना होगा।वासना करना मानों बर्रे के छत्ते को लकड़ी से कोंचने के समान है।और अनेकानेक वासनाएँ तो मानों सोने के पत्तों से आवृत विष की गोलियों के समान हैं…….
इसे ही जानने का नाम वैराग्य/ज्ञान है।
।।हरिश्शरणम्।।