अज्ञान से ज्ञानात्मा(जीवात्मा)आवृत होने के कारण मोह मे फंसता चला जाता है(अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:)और असली बात तो ये है कि-मोह सकल ब्यधिन कर मूला ताते उपजहिं बहु बिध शूला।
उसमें भी अज्ञानी को छोड़ दें ज्ञानी का चित्त भी अविद्यामायाग्रस्त हो जाता है-ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति )इसलिये अज्ञानान्धकार से निवृत्ति के लिये गुरु का शरण ग्रहण करना ही पडेगा ।इसमें गुरु के प्रति आत्मसमर्पण आवश्यक हो जाता है, जिससे नर से नारायण का मार्ग सुगम होता है।ऐसे दिव्य जीवन दाता सद्भाव को अनन्त प्रणिपात -अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरं तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:।
||हरि:शरणम्||