धनाद् धर्म:

बचपन में एक सूक्ति पढ़ी थी,जो मन मे बसी हुई थी।आज पुनः याद आ गई-
विद्या ददाति विनयं
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति
धनाद् धर्म:तत:सुखम्।।
विद्या विनय (विनम्रता)देती है। नम्रता से पात्रता (योग्यता)आती है।और पात्रता से प्राप्त होता है धन ,जिससे धर्म किया जाता है और तब सुखप्राप्ति होती है।
अब विचार करने पर यह क्रम बनता है-विद्या * विनय
* पात्रता * धन *धर्म
* सुख ।
गहन मंथन मे बात आई-
विद्या से तात्पर्य स्कूली शिक्षा ही नहीं, अपितु लोकज्ञान के अतिरिक्त द्वैत रूपस्थ परलोक
का भी ज्ञान हो जाय।मतलब वही गीतोक्त बात “ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:”ज्ञान (परमात्म ज्ञान)और विज्ञान(संसार प्रकृति आदि)की बात जान ली जाय।
इस प्रकार शरीर संसार और ईश्वरीय संरचना सहित परमार्थ विद् मनुष्य की विद्या, उसे विनय देती है।और इस विनय से सम्पन्न व्यक्ति ही, इससे पात्रता (योग्यता)पाता है।
ऐसा विवेकी पात्र विवेक पूर्वक, धर्मानुमोदित धनार्जन करता है,और ऐसे ही प्राप्त धन द्वारा
धर्म(कर्तव्य कर्म)करता है,जिससे वास्तविक सुख मिलता है।
अधर्म द्वारा प्राप्त धन तो निश्चय ही सुखाभास है।साथ ही केवल क्लेश का कारण
बनता है।
शरशैय्यासनस्थ भीष्म वाणी -धर्मदर्थश्च कामश्च धर्म:
किं नैव सेव्यते ,” का नैरपेक्ष्येण नैवेद्य सेवन करते हुए यावज्जीवन सावधान रहना चाहिए।यही विद्या से लेकर सुखप्राप्ति की मंगलदायिनी जीवन यात्रा है।।
।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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