पद्मनाभ भगवान् के मुखपद्म से निकली गीता सर्वशास्त्र-मयी है।जीवन और जीवनातीत अनेक सन्देह-सन्दोह का नि:शेष निराकरण इसका स्वारस्य है।इसके लोकालोक रसानन्द का चरम परमास्वाद सद्गुरू भगवत् कृपा विना असम्भव है।1994 से स्नातक के पाठ्यक्रम मे इसका द्वितीयाध्याय मेरे अध्ययनाध्यापन का विषय बना और सद्गुरू कृपा से विषय-निवृत्ति का श्रीगणेश भी हो गया। अस्तु।
एक स्थान पर ब्रह्माण्ड के अद्वितीय परम शिक्षक ने कहा-त्रैगुण्यविषया
वेदा निश्त्रैगुण्यो भवार्जुन।।
मानापमानयोस्तुल्य:
तुल्यो मित्रारिपक्षयो:।
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीत: स उच्यते।।
सारे वेद और उनका
वेदार्थ सत्वरजस्तमो मय है।इन गुणो का कार्य क्रमशः सुख,दु:ख और मोह होता है, ऐसा गुरुजन कहते हैं।यह बात भी सत्य है कि जन्मजन्मान्तर से प्राप्त संस्कारासंस्कार का परिशोधन तो वेदगुरू मूलक है ही।किन्तु इन गुणों के उपर्युक्त सुखदु:खमोहादि मे कब तक पड़े रहना है? इसीलिये यह बात आई कि हे अर्जुन! अब गुणों से परे होने पर सोचो।
जो व्यक्ति मान और अपमान मे समान व्यवहार करनेवाला,मित्र और शत्रु मे समदृष्टि वाला और समस्त आचारचार का विचार पूर्वक प्रारम्भ और परित्याग करनेवाला है , गुणातीत कहा जाता है।
।।हरिश्शरणम्।।