त्रिगुण और साधक

वृत्ति, शब्द “वृत्”वर्तने धातु से निष्पन्न है।वर्तन का अर्थ व्यवहार से है।अन्त:मे विद्यमान नाना जीवों के गुणस्वभाव को लेकर अहंकार वृत्ति मनुष्य रूप मे जन्मती है।इन्हीं गुणवृत्तियों का शोधन सद्गुरु भगवान् की कृपा से करणीय है।भागवत के एकादश स्कन्ध मे वृत्तियों के शोधन हेतु शुकवाणी इस प्रकार है-निस्संगे मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रिय:।रजस्तमश्चाभिजयेत् सत्वसंसेवया मुनि:।।सत्वं चाभिजयेद् युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधी:।सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीवं विहाय माम्।।जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्चाशयसम्भवै:।मयैव ब्रह्मणा पूर्णो वहिर्नान्तरश्चरेत्।।अर्थात्-साधक सर्वप्रथम अपनी वृत्तियों को समझे कि वे किस गुण मे बरत रही हैं।गुण “वृत्ति”का ही कार्य है, आत्मा का नहीं।यह बातें गुरु के द्वारा ही कोई साधक पूर्णतया समझ सकता है तथा साधन मे उतार सकता है।जब तक तीनों गुणों की वृत्तियों के स्वरुप तथा कार्य को नहीं समझ सकता है तब तक वह कैसे समझेगा कि मेरी वृत्ति इस समय किस गुण मे बरत रही है।वे कहते हैं-रजोगुण तथा तमोगुण वृत्तियों को दबाकर सत्वगुण वृत्ति उत्पन्न की जाती है।सत्वगुण वृत्ति शान्त हृदयाकाश की धारणा को कहते हैं।(इस शान्त हृदयाकाश का अनुभव साधक को कुम्भक प्राणायाम मे होता है)वही वृत्ति प्रकाश स्वरूप, आनन्द स्वरूप तत्व का अनुभव कराती है।उस समय सत्वगुण पर भी साधक विजय प्राप्त कर लेता है।साधक पहले अपनी बुद्धि मे भर लें कि हृदयाकाश मे ही शान्ति वृत्ति ठहरती है।जब यही शान्ति वृत्ति संकल्प विकल्प करती है तो रजोगुणी वृत्ति हो जाती है, अन्यथा हृदयाकाश मे स्थिरावस्थ रहने पर,तो सत्वगुणी ही है।तृतीय अवस्थान मे इसी शान्ति वृत्ति की लीनता मे तब तन्द्रा आ जाती है, तब यही तमोगुणी वृत्ति होती है।वस्तुतत्वधारणा होने पर, हृदयाकाश मे स्वस्थ शान्ति वृत्ति जीवत्व (भाव)अर्थात् अविद्या को छोड़कर स्वस्वरुपावगतिस्थ स्थिति मे ब्राह्मी वृत्ति बन जाती है।।योगश्वर ने कहा भी कि-सैषा ब्राह्मी स्थिति:पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।।नहीं तो अहंभाव से जन्मना मरना भी ध्रुव है।

||हरि:शरणम्||

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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