शुभदात्री और अशुभहन्त्री माँ भगवती

हे भगवती! यह कोई बताये कि ऋषियों का कौन सा कथन तुम्हारी स्तुति नहीं है।यह बात निर्विवाद रूप से सनातन सत्य है कि सम्पूर्ण शब्द राशि तुम्हारा ही शरीर है।तुम्ही अनुच्चरित अर्थ रूपस्थ ,अनुच्चार्य अर्ध मात्रास्थ तथा प्रकटीकृत शब्द स्वरूप भी हो।संसार की समस्त मूर्तियों(शरीरों )मे तुम्हीं विद्यमान हो चाहे वह बाहर दृश्य हो अथवा अन्त:दृश्य मानस मात्र।शुभदात्री और अशुभहन्त्री भी तुम्हीं हो।आपकी कृपा करूणा पूर्ण दृष्टि मात्र से अतिशय स्नेहवशात् यह मानव जन्म प्राप्त है।अतः मेरे लिये आपके द्वारा प्रदत्त समय का अंशमात्र भी आपकी स्तुति, जप,अर्चन,चिन्तन से विहीन नहीं है।आपकी करूणार्द्र दृष्टि ऐसी बनी रहे कि मैं आपका भजन(आप द्वारा सृजित सृष्टि की सेवा )करता रहूँ-“तव च का किल न स्तुतिरम्बिके ,सकलशब्दमयी किल ते तनु:।निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो मनसिजासु बहि:प्रसरासु च।इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे जगति जातमयत्नवशादिदम्।स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन कालकलास्ति मे।”

||शिव:शरणम्||

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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