लोक सेवक वास्तविक जन सेवक बने

“सुत वित लोक ईषणा तीनी ,केहि कर मति एहि कृत न मलीनी “एषणा त्रयत्याग:संन्यास:”धन,सन्ततिऔर लोकप्रतिष्ठा की प्रबलेच्छा सभी मे सामान्य है,जो मानवीय मनोमालिन्य की परिणति को प्राप्त होती है।देश की आजादी से लेकर आज तक राजनीतिज्ञ शासक और लोक सेवा आयोग से चयनित लोक सेवक जन (Public Servent)इसी भ्रम के वशीभूत रहे है।ऐसे लोगों ने पैसे को ही सर्वोपरि मान मूल लक्ष्य सेवा कार्य से भटक गये।जिससे समाज सेवा व्यक्ति सेवा मे केन्द्रित हो गई।लेकिन भगवत् कृपा से साधु भावी और सेवा भावी सज्जनो के पास सत्ता संचालन का दायित्व आ पडा है।भगवान कृपा करें ऐसे साधु लोग पैसों के लोभ मे न पडे।क्यों कि -“पैसा पापी साधु को परसि लगावै पाप ।परसि लगावै पाप ज्ञान वैराग्य बिगारै।काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर शृंगारै।सब द्रोहिन सो बडो सन्त द्रोही नहि ऐसा।भगवत रसिक अनन्य भूलि परसो जनि पैसा।”इसलिये शासन के सूत्रधार साधु अत्यंत सावधानी बरतें।

||हरि:शरणम्||

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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