“स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि ।आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा।”स्नेह,दया, सुख और यहाँ तक कि अपनी प्रियतमा जानकी भी क्यों न हो मुझे लोक(प्रजा)के अनुरंजन के लिये कुछ भी त्यागने मे कठिनाई नहीं है।”यह है राजा राम के लोक मंगल का संकल्प, यही है गान्धी के सपनों का रामराज्य ,जिसे अपनों ने सपना ही बना रहने दिया।सौभाग्य से भगवत् कृ पा से देश के किसी कोने से राम राज्य के स्वर्णिम सूर्योदय की आभा दीख रही है।भगवान राम कृष्ण रक्षा करें।
||हरि:शरणम्||