मन ही समस्त संसार का मूल है।अध्यात्म रामायण सहित अनेक ग्रन्थों मे चर्चा है-
मन एव हि संसारो बन्धश्चैव मन: शुभे। आत्मा मन:समानत्वमेत्य तद्गतबन्धभाक्।।
भगवान् राम कहते हैं कि-हे तारा! मन ही संसार है-जैसै चीनी का मृग चीनी से भिन्न नहीं, वैसे ही मन से भिन्न संसार नहीं।चीनी निकाल लेने पर जैसै मृग की सत्ता नहीं है, वैसे ही मन के अमनीभाव मे जगत् सत्ता नष्ट हो जायेगी।आत्मा से मन के तादात्म्य होने से अज्ञान वश बन्धन होता है।
किन्तु जिसने मन को जीत लिया उसने जगत् को जीत लिया।मन के वश मे सम्पूर्ण इन्द्रियाँ हैं मन किसी के वश मे नहीं।गोस्वामी जी ने बहुत सुन्दर बात कही है-
असन बसन पशु वस्तु विविध विधि, सब मणिमह रह जैसै।
स्वर्ग नरक चर-अचर लोक ,
बहु बसत मध्य मन तैसे।।
एक मणि के भीतर असन
बसन ,हाथी, घोड़े आदि सब हैं।उसी तरह स्वर्ग, नरक,अपवर्ग तथा चर अचर
चौदहों लोक मन के भीतर हैं।मन ही माया है, मन ही विष्णु है, मन ही ब्रह्मा है और मन ही शिव भी।मन ही जगत् है, मन ही जीव है तथा मन ही अनेक रूप धारण करता है।मन ही जगदाकार ,शब्दाकार,स्पर्शाकार,रूपाकार, जपाकार,अध्याकार और ब्रह्माकार भी।यही बन्धन और मोक्ष भी।सारे कार्य मन द्वारा रचे गए हैं।आत्मा असंग और अलेप है।जो मन विषयासक्त वही बन्धन देता है और जो मन विषयों से अनासक्त है, वह मोक्ष प्राप्त कराता है(मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:)
जहाँ तक ऐन्द्रिक प्रतीति है वह सब मनोमात्र है।मन के अमनीभाव मे द्वैत प्रतीति नहीं होगी।।
आखिर यह अमनीभाव कैसे हो? इसके लिये विद्वान् साधक को समस्त संकल्प(कामाकाम)त्यागने होगें।यह अवस्था ज्ञेयाभिन्न ज्ञान की है ।इसमें भी अमनीभाव की दो स्थितियां हैं-
एक सबीज और दूसरी निर्बीज
सुषुप्ति मे सबीज रहता है।और
समाधि मे निर्बीज(नाश)।।
वस्तुतः ऐन्द्रिक वृत्ति
आत्मा की अनुभूति मे असमर्थ होती है, किन्तु संयम की होने पर वही वृत्ति निरोध की दृढावस्था मे आत्मानुभूति कराती है।मन वाणी प्रारम्भिक अवस्था मे साधन अवश्य हैं, किन्तु ये बहुत दूर से चुपके से खिसक कर भाग लेते हैं, क्योंकि इनका आत्मा कोई सम्बन्ध नहीं है।(यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कदाचन)
आत्मानुभूति के समकाल मे मनोनाश ,वासनाक्षय और अमनीभाव तथा निर्भय आनन्द प्राप्त है।भगवत् कृपा इसमें सहायक हो।
|।हरिश्शरणम्।|