ईश्वर का वरदान- मानव शरीर

बडे भाग मानुष तन पावा -“भगवत् कृपा नाना शरीरों की यात्रा करके इस मानव शरीर की प्राप्ति हुई है।और केवल मानव शरीर ही भक्ति-प्रेम-श्रद्धा का अर्थ समझ सकता है।इसमे प्रेम कुछ ऐसा विशिष्ट तत्व है, जो श्रद्धा और भक्ति दोनों मे समाविष्ट है।वस्तुतः प्रेम तो परमात्मा का अविचल स्वस्वभाव है।वह सभी से प्रेम करता है, सर्वत्र-सर्वव्यापक है।इसलिये हमें उनको समूल सृष्टि मे दृष्टिगत करना पडेगा।इस दृष्टिकोण द्वारा हमारी वैषयिक वासनाएं गल जायेंगी और इन्धन से प्रकटित अग्नि की तरह उनका दर्शन होने लगेगा-“भिद्यते हृदय-ग्रन्थि:,छिद्यन्ते सर्वसंशया:।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि, तस्मिन् दृष्टे परावरे |

||हरि:शरणम्||

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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