गीता के तृतीय अध्याय के सत्ताइसवें एवं त्रयोदश अध्याय के उन्तीसवें श्लोक में भगवान् ने ,कर्तापन के अभिमान से मुक्त होने का आदेश दिया है।
वे कहते हैं –
प्रकृतेः क्रियमाणानि
गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहंकार विमूढात्मा
कर्ता अहम् इति मन्यते।।3/27।।
अर्थात् सम्पूर्णता कर्म वास्तव में, प्रकृति के गुणों के द्वारा ही किए जाते हैं।अहंकार से मोहित हुए अन्त:करण वाला अविद्या के प्रबल प्रभाव से अज्ञानी व्यक्ति “मैं करने वाला हूँ ” ऐसा
मानने लगता है।
यही बात उन्होंने त्रयोदश अध्याय में भी कही-
प्रकृत्यैव च कर्माणि
क्रियमाणानि सर्वश:।
य: पश्यति तथा आत्मानं
अकर्तारं स पश्यति।।13/29।।
जो मनुष्य समस्त कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हुए देखता है तथा आत्मा को कर्मों का अकर्ता रूप में देखता है, वही यथार्थ देखता है।
इस समग्र दृष्टिकोण में सारी समस्या ये है कि हम अपने को अपने शरीर से भिन्न नहीं मानते।जब हम अपने को, अपने शरीर से अलग मान कर चलना प्रारम्भ कर दें, तो इसका निदान सम्भव है।
हमें मानना पड़ेगा कि सत्व,रज और तम -ये तीनों प्रकृति के ही कार्य हैं।तथा इन्द्रियाँ, मन,बुद्धि आदि एवं इनके विषय भी गुणों के विस्तार हैं।यही ,”इन्द्रियों का इन्द्रियों के विषयों में बरतना है “इसे ही “गुणों का गुणों में बरतना” अथवा “प्रकृति द्वारा कर्मों का किया जाना” है ।
ह
सीधे शब्दों में निष्कर्ष निकला कि -“प्रकृति में ही कर्तापन है ,आत्मा में नहीं”
हम जन्म जन्मान्तर की अविद्या से ग्रस्त होने के कारण आत्मा, मन,बुद्धि, और शरीर को कर्ता-भोक्ता मान बैठे हैं।
नित्य,शुद्ध, बुद्ध, चैतन्यात्मा निर्विकारी होने से, कर्म करने के क्षेत्र में प्रकृति के साथ कोई भी सम्बन्ध न होने से ,कर्ता तो हो ही नहीं सकता।
वस्तुतः, असंग आत्मा न किसी कर्म का कर्ता है और न ही कर्म फलों का भोक्ता।हम जन्मान्तरीय संस्कार के अहंकार वश अपने(आत्मा)को कर्ता-भोक्ता मानते हैं।
यही अहंकार ही जन्मता-मरता है, शरीर धारण करके।
अतः भगवान् के कथन हैं कि
” प्रकृति को कर्मों का कर्ता तथा आत्मा को अकर्ता रूप से देखने वाला ही यथार्थ दृष्टिकोण वाला है”
साधना और अभ्यास से ऐसी सम्यग्दृष्टि ,भगवत् कृपा परायण होकर पाई जा सकती है भगवान् सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।