सर्वाशाध्वान्त-निर्मुक्तं,सर्वाशाभाष्करं परम्

सर्वाशाध्वान्त-निर्मुक्तं,सर्वाशाभाष्करं परम्।चिदाकाशावतंसं ,तं सद्गुरूं प्रणमाम्यहम्।।दिक्-कालादि-अनवच्छिन्न-अनन्त-चिन्मात्र-मूर्तये,स्वानुभूति-एक-मानाय नमः शान्ताय तेजसे। अर्थात्-सारी आशाओं(दिशाओं)मे व्याप्त ध्वान्त(अन्धकार)से निर्मुक्त ,समस्त दिशाओं को अपने (ज्ञान के) आलोक से प्रकाशित करनेवाले, चित्(चेतन )मात्र आकाश(ब्रह्म)मे अधिष्ठान ग्रहण करनेवाले, सद्गुरू भगवान को बारम्बार प्रमाण है।।दिशा, काल आदि से अपरिच्छिन्न अर्थात् जिसे दिशा कालादि व्याप्त नहीं कर सकते, वह उन्हें अवश्य अभिव्याप्त करके रहता है।अनन्त चेतन मात्र मूर्ति स्वरूप वाले तथा स्व(अपनी आत्मा)मे ही जिनकी अनुभूति ही एकमात्र मान(प्रमाण) है, ऐसे शान्तहृदयाकाशविराजित शान्त केवल तेज:स्वरूप परमात्मा को अनन्त प्रणाम है।

हरि:शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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