भौतिक संसाधनों से “नासा”के विज्ञान वेत्ता, इस प्रकृति मे और समग्र ब्रह्माण्ड मे,जब “ओ3म्”की ध्वनि(गूंज और अनुगूँज)का नैरन्तर्य सुनते हैं, तब वे वैज्ञानिक-गण हमारी ऋषि परम्परा का स्पर्श करते हुए प्रतित होते हैं।यह ओंकार वेदों मे”प्रणव”भी कहा गया है, जो कि ब्रह्माण्डीय प्रकृति के श्वास-प्रश्वास मे प्रतिक्षण प्रवहमान है।”प्रणव”ब्रह्मवत् निराकार, निर्गुण होकर भी अपने तीनों अक्षरों से सगुण”राम-नाथ”का संवाहक हो जाता है।सगुण से निर्गुण और निर्गुण से सगुण की निरन्तर इस महायात्रा मे ब्रह्मवत्”प्रणब”अदृश्य, निराकार, वायुस्वरूप अनन्त आकाश मे ही परा चेतना और अपनी योगावगत योग्यता से स्वस्वरूपानुभूति द्वारा श्रूयमाण है।इसको जानने और स्वस्थ सानन्द रहने की अनुपम विधि इसी शरीर-पिण्ड मे”योग”के माध्यम से वर्णित है।वस्तुतः यह (अष्टांग)योग,(मानव)व्यष्टि से(ब्रह्माण्ड)समष्टि की अद्भुत प्रविधि है ,जिसमें भारतीय मनीषा का शाश्वत वैश्विक शान्ति का मनोहर सन्देश छिपा हुआ है।और आज तो ऐसा लगता है कि इन्हीं कारणों से”भारत”विश्व गुरु रहा है और रहेगा, क्योंकि अनेक परम्पराओं, संस्कृतियों को जानने मानने वाले अनेक लोग 21जून के प्रति आकृष्ट होकर, योगध्यान करते हुए अदृष्ट शान्तानन्द की कामना मे तल्लीन ,मन्त्रमुग्ध हैं।आज21जून2017को तृतीय”अन्ताराष्ट्रिय योग दिवस”मनाये जाने के सूत्रधार, ऋषि परम्परा के धारावाहिक, सहयोग-सह-अस्तित्व के अनुपम पुरोधा भारत के (प्रधान सेवक)प्रधानमन्त्री और उनकी प्रेरणा स्रोत अदृश्य ऋषि सत्ता को अनन्त कोटिक नमन करता हूँ।यह “योग”का”प्रयोग”वैश्विक स्तर पर ,समस्त द्वन्द्वों पर विजय करते हुए, आतंकवाद और अन्याय को मिटाकर, सानन्द-जीवन की साधन-कला है।
हरिश्शरणम्।ओ3म्।