घण्टा, घडियाल, तिलक एवं माला मात्र से ही भक्ति नहीं होती है, ये सभी साधन हो सकते हैं।ज्ञान और भक्ति मे भी अन्तर है।भगवान् भाष्यकार कहते हैं-“स्वस्वपानुसन्धानं
भक्तिरित्यभिधीयते “अर्थात्
स्वस्वरूप अपने आत्मा के
अनुसन्धान वाली वृत्ति उत्पन्न
करना ही भक्ति का मूल है।
ज्ञान क्या है-“ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् “अर्थात्-
आत्मा और परमात्मा के एकत्व दर्शन का नाम ज्ञान है।
वस्तुतः जब तक आत्मानुसंधान वृत्ति नहीं उत्पन्न होगी, तब तक सौ जन्मो तक ज्ञान नहीं होगा और मुक्ति भी नहीं होगी।भगवान ने अध्यात्म रामायण मे हनुमानजी
कहा था-“मद्भक्तिविमुखानां
हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।न
ज्ञानं न च मोक्ष:स्यात् तेषां
जन्मशतैरपि।” अर्थात्-शास्त्र रूपी गड्ढे मे मोहित लोगों को
मेरी भक्ति भी नहीं प्राप्त होगी और ज्ञान भी नहीं होगा।
भक्ति से ही ज्ञान विज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है,और वस्तुतः भक्ति(माता)के दो
पुत्र हैं-ज्ञान और विज्ञान।
“जा ते वेगि द्रवौं मैं भाई।सो मम भक्ति भक्त सुखदाई।।सो स्वतंत्र अवलम्ब न आना।
जेहि आधीन ज्ञान विज्ञाना ।।
अर्थात्-जिससे मैं शीघ्र द्रवित होता हूँ, वह क्या है-मेरी भक्ति है।और भक्ति स्वतंत्र है ज्ञान विज्ञान उसके पुत्र हैं।इसलिए माता के बिना पुत्र का जन्म नहीं हो सकता और यह भक्ति ही
सुख का मूल है -“तात भगति
अनुपम सुख मूला।मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।”अनुकूलवेदनीयत्वं सुखं”अनुकूलता सुख का अपर पर्याय है।और यह अनुकूलता समग्र सृष्टि के प्रति हो तभी सन्त, भगवन्त भी मिलेंगे, जोकि सुख का मूलाधार है।
हरिश्शरणम्।।