वाणी के चार स्वरुप

वाणी के चार स्वरुप शास्त्र मे गिनाए गये हैं-परा(तुरीयरूपा),पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी।इसके स्थान क्रमशः निर्धारित हैं-नाभि, हृदय, कण्ठ और मुख के बाहर का अविच्छिन्न आकाश।इस विवेचना से ऐसा लगता है कि-नाभि मे सुषुप्त अवस्था मे विद्यमान वाणी(परा) हृदय(आकाश)देश से(अर्थवत्ता को प्राप्त पश्यन्ती )होती हुई,कण्ठ मे (मध्यमा मे)आती है।और जो साधक इन इन वाणी के अवस्थानों की अनुभूति किए रहते हैं, वे आवश्यकता के अनुरूप उसे वहीं कण्ठगत रख लेते हैं अथवा बहुत आवश्यक होने पर, बाहर आकाश गत अभिव्यक्त कर देते हैं।यही रहस्य मितभाषी होने का है।योगप्रक्रिया मे साधक ,पूर्वतः मालादि साधनों और बाद मे उसे भी त्याग कर अपने मन्त्र देवता का मन मे ही स्मरण(जप)करते हैं।यह चित्त शुद्धि का प्राथमिक प्रयोग है।इसी प्रक्रिया को योगी-वाचं यच्छ मनो यच्छ ,कहकर विवेचित करते हैं।अतः आत्मोपलब्धि के साधक वाचिक भजनादि के अतिरिक्त,वाणी को मनोगत अर्थात् मन मे निलीन करके, मन की साधना मे लगें।यही मन सब कुछ बनाता बिगाड़ता है -“माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर, कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर “।
हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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