ममैवांशो जीवलोके, जीवभूतः सनातन:। ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

ममैवांशो जीवलोके, जीवभूतः सनातन:। ईश्वर अंश जीव अविनाशी। इत्यादि गीतोक्त एवं मानस के वचनों से जीवात्मा मनुष्य कीअविनाशिता, सनातनता, चेतनता, निर्मलता और सुखरखशिता स्वतः सिद्ध होती है क्योंकि, वह ईश्वर का अंशभूत है। अब इस जीवात्मधारी मनुष्य की पाप-पुण्य परता और दु:खसंगता क्यों होती है, यह विचारणीय है-“अस प्रभु अछत हृदय अविकारी, सकल जीव जग माहिं दुखारी।।” इसका उत्तर भगवान ने गीता मे-“काम एष:”
कहकर दिया।मतलब कि यह कामना ही(शरीर, संसार की)सारी विपत्तियों का मूल है।अतः कामनाओं का त्याग सर्वानन्द का द्वार है। मनसा, वचसा, कर्मणा इसी का परित्याग वेदान्त धर्म का सार है।इसी बात को और स्पष्ट करते हुए हमारे स्वामी विवेकानंद जी ने अपने अनेक व्याख्यानों मे कहा है-“जब तक कामिनी कांचन का त्याग नहीं होगा, आत्मोपलब्धि, स्वस्वरुपावगति(भक्ति)और आत्मैकत्व प्राप्ति,अथवा मुक्ति भी नहीं होगी।”हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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