आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।पंचैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः

आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।पंचैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।
अर्थात्-आयु ,जीवन-वृत्ति, चलाचल संपत्ति, विद्याध्ययन और शरीरान्त का प्रकार ,ये सभी पांच चीजें प्रारब्ध(पूर्व शरीर से कृत संचित कर्म)
द्वारा निर्धारित हो जाती हैं।
ऐसी बातों पर मैं सुविचारित
दृष्टिपात करता हूँ, तो यह लगता है कि, ज्योतिष आदि का सटीक निर्देश लेकर विज्ञ लोग कार्य करें।वर्तमान जीवन के क्रियमाण और संचित होते रहने वाले कर्मों से उपर्युक्त पाँचों मे परिवर्तन सम्भव है।किन्तु इसके लिए सद्गुरूशरण अनिवार्य है।और इन सभी के लिये कामना परक स्थिति से ऊपर उठना होगा।तभी हरिगुरू कृपा से उक्त पाचों मे परिवर्तन सम्भव है।हरिश्शरणम्।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment