कहते हैं परमात्मप्राप्ति किसी सम्प्रदाय द्वारा अथवा प्रवचनादि द्वारा भी सम्भव नहीं।वस्तुतः परमात्मा तो आत्मा(नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन)
द्वारा हृदय देश मे स्वयं के अनुसन्धान का विषय है।बालकाण्ड मे –
उघरहिं विमल विलोचन ही के।
मिटहिं दोष दुख भवरजनी के।।
यहाँ “ही ” शब्द का प्रयोग हृदय देश हेतु किया गया
प्रतीत होता है।वही तीसरा नेत्र है।जो स्वयं प्रकाश परमात्मा बुद्धि को प्रकाशित करता है,वही हृदयस्थ है।
“बुद्धेरात्मा महान् पर: “यही बुद्धि से श्रेष्ठ
आत्मा वर्णित है।इसका तात्पर्य है कि आत्मा से अविकल तादात्म्य केवल बुद्धि का है,जो बुद्धि चैतन्य होकर कण्ठ मे स्वप्न का कार्य तथा नेत्र पर आकर जगत् को देखने, सुनने, सूँघने व स्पर्श करने का कार्य करती है।वुद्धि के साथ जो “मैं” पन है, वही बन्धन है और जन्म-मृत्यु और अविद्या का
स्वरूप है।जब तक बुद्धि के अन्दर उससे विलक्षण और इसके प्रकाशक “चैतन्य”की अनुभूति नहीं होगी, तब तक (अहंकार)मैं पन की निवृत्ति भी नहीं होगी।चैतन्य,बुद्धि का प्रकाश स्वरूप स्वयमेवानुभव गम्य है।वाणी का विषय कदापि
नहीं।गोस्वामी जी ने कहा-
सन्मुख जीव होहिं मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं।।
अर्थात् जब तक बुद्धीन्द्रिय निर्मल नहीं होगी
तब तक तीसरी आँख नहीं खुल सकती और जीवात्मा साधक आवागमन से मुक्त भी नहीं हो सकता।यही सनातन धर्म का सार है।।
|| हरिश्शरणम् ||
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